आदिपुराण ग्रंथ की पूजा करने से पूजा करनेवाले को क्या फल मिलता है?* शांति एवं विघ्न नष्ट आरोग्य एवं मंगल की प्राप्ति संतोष एवं पुष्टि की प्राप्ति कर्म निर्जरा
आदिपुराण जैसे महाग्रंथ की पूजा / स्वाध्याय का फल जैन दर्शन से देखें तो यह केवल एक नहीं, अनेक प्रकार का होता है। आपके दिए हुए चारों ही बिंदु सही हैं, पर उनका स्तर अलग‑अलग है:
- शांति एवं विघ्न नष्ट
भावपूर्वक ग्रंथ‑पूजा से मन शान्त होता है, चित्त एकाग्र होता है, क्रोध‑चिन्ता जैसे कषाय कम होते हैं – इससे जीवन में विघ्न कम अनुभव होते हैं। यह व्यवहारिक (सांसारिक) फल है।
- आरोग्य एवं मंगल की प्राप्ति
नियमित पूजा‑पाठ, संयमित जीवन, सात्विक दिनचर्या से स्वास्थ्य सुधरता है, शुभ विचार बढ़ते हैं – इसे जैन शास्त्र मंगल कहते हैं। यह भी व्यवहारिक, दिखाई देने वाला फल है।
- संतोष एवं पुष्टि की प्राप्ति
आदिपुराण में भगवान आदिनाथ, भरत‑बाहुबली आदि के आदर्श जीवन का चिंतन करने से राग‑द्वेष घटते हैं, संतोष, धैर्य, वैराग्य और आंतरिक तृप्ति बढ़ती है – यह आत्मिक पुष्टि है।
- कर्म निर्जरा – सबसे मुख्य फल
सही रीति से – - देव‑गुरु‑धर्म में दृढ़ श्रद्धा, - विनय, - राग‑द्वेष रहित शुद्ध भाव के साथ ग्रंथ‑पूजा / श्रवण किया जाए तो उससे पुण्य बंध भी होता है और विशेषतः पाप कर्मों की निर्जरा (क्षय) भी होती है। यह शास्त्रीय दृष्टि से आदिपुराण पूजा का सबसे उच्च और वास्तविक फल है।
इसलिए संक्षेप में: आदिपुराण ग्रंथ की पूजा से ऊपर बताए गए चारों ही फल मिलते हैं; पर जैन दर्शन के अनुसार सर्वोपरि फल है – कर्म निर्जरा और आत्मा की शुद्धि।