कमंडलु के जल से कौन पवित्र हुआ है?
जैन दृष्टि से:
कमंडलु के जल से कोई भी पवित्र नहीं हुआ है।
जैन धर्म में पवित्रता का अर्थ है – आत्मा का राग‑द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि से शुद्ध होना। यह शुद्धि केवल
- सम्यक् दर्शन (सही श्रद्धा)
- सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान)
- सम्यक् चरित्र (सही आचरण)
इनसे होती है, किसी बाहरी जल, स्नान या कमंडलु के जल से नहीं।
इसलिए इस प्रकार के प्रश्न का उत्तर जैन सिद्धांत के अनुसार यही है: आत्मा को कोई बाहरी जल पवित्र नहीं कर सकता; वह केवल रत्नत्रय से ही पवित्र होती है।