अवसर्पिणी काल के सुषमा सुषमा काल के मनुष्य नियम से स्वर्ग ही जाते हैं?* जरूरी नहीं है सही गलत जा भी सकते हैं नहीं भी
नहीं, ऐसा “नियम” नहीं है कि अवसर्पिणी काल के सुषमा‑सुषमा में जन्मे सभी मनुष्य सीधे स्वर्ग ही जाएँ।
जैन सिद्धांत के अनुसार:
- गति (अगला जन्म) कैसे तय होती है?
हर जीव की अगली गति – नरक, तिर्यंच, मनुष्य या देव – उसके - वर्तमान कर्मों (पुण्य‑पाप), - मरण‑काल के भाव (अंतिम समय की मानसिक स्थिति), - और पुराने संचित कर्मों पर निर्भर है।
इसलिए किसी काल में, किसी भी देश‑काल में जन्मा मनुष्य हो – केवल “मनुष्य” होने या “सुषमा‑सुषमा” काल में होने से ही स्वर्ग जाना पक्का नहीं हो जाता।
- सुषमा‑सुषमा काल का अर्थ
अवसर्पिणी में शुरू के दो आरस (सुषमा‑सुषमा, सुषमा) में - आयु लम्बी, - स्वास्थ्य, सुख‑सुविधा, - धर्म‑अनुकूल वातावरण बहुत श्रेष्ठ होता है।
इसका परिणाम यह होता है कि ऐसे काल में पुण्य करने के अवसर और भी अधिक होते हैं, तो स्वर्ग‑गति की संभावना भी ज़्यादा हो सकती है। लेकिन “संभावना ज़्यादा” होना और “सबका स्वर्ग जाना निश्चित” होना – दोनों अलग बातें हैं।
- क्या नरक या निम्न गति भी संभव है?
हाँ। - यदि वहाँ भी जीव कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ), - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, - या अत्यन्त अधर्म वाले भाव करेगा, तो वह नरक या नीच योनियों में भी जा सकता है।
जैन धर्म में कोई ऐसा सार्वभौम नियम नहीं दिया गया कि “फलाँ काल के मनुष्य केवल देव ही बनते हैं।”
- निष्कर्ष (आपके वाक्य पर)
आपने जैसा लिखा – “जरूरी नहीं है, सही गलत – जा भी सकते हैं, नहीं भी” – सिद्धांत के हिसाब से यही ठीक है: - सुषमा‑सुषमा के मनुष्य अच्छे पुण्य से स्वर्ग भी जा सकते हैं, - और कर्म‑भाव बुरे होने पर स्वर्ग न भी जा सकते हैं, नरक या तिर्यंच आदि गति भी मिल सकती है।
इसलिए निर्णय “काल” से नहीं, व्यक्ति के कर्म और भाव से होता है।