Shaantidhara arthsahit jain
“शांतिधारा” का सरल अर्थ (अर्थ‑सहित)
१. ‘शांतिधारा’ क्या है?
- “शांति” = शांति, सुख, मंगल
- “धारा” = धार, लगातार बहना
मुख्य भाव (अर्थ)
- अपनी अशांति, क्लेश, रोग, बाधाएँ मिटाने की प्रार्थना
- घर‑परिवार, समाज और सभी जीवों के लिए शांति माँगना
- अपने कर्मों की अशुद्धि धोने का प्रतीक
- भीतर शांत, अहिंसक, क्षमाशील बनने का संकल्प
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२. साधारण मंत्र और उसका अर्थ
बहुत जगह शांतिधारा में एक छोटा मंत्र बोला जाता है, जैसे:
“ऊँ ह्रीँ शांतिधाराय स्वाहा”
इसे सरल भाषा में ऐसे समझ सकते हैं:
- ऊँ – पवित्र ध्वनि; सभी सिद्ध, आरिहंत, परमात्मा की स्मृति।
- ह्रीँ – दिव्य शक्ति (शुद्ध आत्मा की शक्ति) का बीज‑मंत्र।
- शांतिधाराय – हे शांति प्रदान करने वाले, सबको शांति देनेवाले!
- स्वाहा – मैं अपनी अहंकार, क्रोध, लोभ आदि को आपकी शरण में समर्पित करता/करती हूँ।
संपूर्ण भाव: > “हे परम शांति स्वरूप जिनेन्द्र! > मेरी और सभी जीवों की अशांति मिटे, > रोग‑शोक‑बाधाएँ दूर हों, > सबको भीतर‑बाहर सच्ची शांति और सम्यक् भाव मिले।”
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३. शांतिधारा करते समय भीतर का भाव
शांतिधारा का असली फल बाहरी जल से नहीं, अंदर के भाव से मिलता है। अंदर‑अंदर यह भाव रखना चाहिए:
- क्षमा‑भाव – जिन लोगों से भी राग‑द्वेष है, उन्हें मन से क्षमा करना।
- अहिंसा‑भाव – किसी को भी जरा‑सी भी हिंसा न हो, ऐसी प्रार्थना।
- समता‑भाव – सुख‑दुख में बराबरी, शांत मन से सब स्वीकार करना।
- मंगल‑भाव – “सभी जीवों का भला हो, सबको शांति मिले” – ये भावना।
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४. दिगंबर – श्वेतांबर परंपरा का संक्षिप्त अंतर
- दोनों परंपराओं में ‘शांतिधारा’ का मूल भाव एक‑सा है –
- मंत्र और विधि (कितने श्लोक, किस क्रम से, किस दिन)
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५. संक्षेप में शांतिधारा का फल (जैन दृष्टि से)
- अशुभ भाव (क्रोध, मान, माया, लोभ) को शांत करना
- पुण्य के कारण से क्लेश, रोग, बाधा में हलकापन
- घर‑परिवार में शांत वातावरण, सद्भाव, सहनशीलता बढ़ना
- सबसे महत्त्वपूर्ण – आत्मा को मोक्ष‑मार्ग पर अग्रसर करने की प्रेरणा
यदि आप शांतिधारा की पूरी विधि या पूरा पाठ (श्लोक‑वार) अपने समुदाय की परंपरा के अनुसार सीखना चाहते हों, तो उसे अपने स्थानीय गुरु, आचार्य या पाठशाला से लेना सबसे शुद्ध और सही रहेगा, क्योंकि हर संघ का क्रम थोड़ा भिन्न हो सकता है।
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