Jain Knowledge
Menu
  • JainGPT
  • Jain Directory
    • Jain Tirthsthaans
    • Jain Sangeetkars
    • Jain Pandits
    • Jain Acharya
    • Jain Businessman
  • Jain Media
    • Jain Stavan
    • Jain Pachkhan
    • Jain Stories
    • Jain Sutras
    • Jain Facts / Concepts
  • Advertise with us
Jain Knowledge
login Register

Get In Touch

phone
info@jainknowledge.com

online support

phone
Mumbai

India

  • Home
  • Jain Questions
  • Logan ka path with meaning
  • author Posted by
    Jain Follower

    Logan ka path with meaning

    8 months ago 177

    यहाँ “लोगस्स” (Logassa / Logassa Sutra / Chaturvimshati‑stavan) का पाठ और सरल अर्थ दिया जा रहा है।

    ---

    लोगस्स सूत्र – मूल पाठ (प्राकृत – देवनागरी में)

    1️⃣ लोगस्स उज्जोअ‑गरे, धम्म‑तित्थ‑यरे जिणे अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥

    2️⃣ उसभ‑मजिअं च वंदे, संभव‑मभिणंदणं च सुमइं च पउम‑प्पहं सुपासं, जिणं च चंद‑प्पहं वंदे ॥२॥

    3️⃣ सुविहिं च पुप्फ‑दंतं, सीअल‑सिज्जंस‑वासु‑पुज्जं च विमल‑मणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ॥३॥

    4️⃣ कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणि‑सुव्वयं नमि‑जिणं च वंदामि रिट्ठ‑नेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥

    5️⃣ एवं मए अभिथुआ, विहुय‑रय‑मला पहीण‑जर‑मरणा चउ‑वीसं पि जिणवरा, तित्थ‑यरा मे पसीयंतु ॥५॥

    6️⃣ कित्तिय‑वंदिय‑महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा आरुग्ग‑बोहि‑लाभं, समाहि‑वर‑मुत्तमं दिंतु ॥६॥

    7️⃣ चंदेसु निम्मल‑यरा, आइच्चेसु अहियं पयास‑यरा सागर‑वर‑गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥

    ---

    सरल अर्थ (Line‑by‑Line, बहुत आसान भाषा में)

    1.

    लोगस्स उज्जोअ‑गरे, धम्म‑तित्थ‑यरे जिणे अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली
    • मैं इस संसार (लोक) को प्रकाश देने वाले
    • धर्म‑तीर्थ की स्थापना करने वाले जिनेन्द्रों (तीर्थंकरों) की
    • अरिहंतों की स्तुति करूँगा,
    • जो चौबीसों के चौबीस केवलज्ञानी (सब कुछ जानने वाले) हैं।

    अर्थ: मैं उन चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति करता हूँ, जो पूरे लोक को धर्म का प्रकाश देने वाले और केवलज्ञान प्राप्त अरिहंत भगवान हैं।

    ---

    2.

    उसभ‑मजिअं च वंदे, संभव‑मभिणंदणं च सुमइं च पउम‑प्पहं सुपासं, जिणं च चंद‑प्पहं वंदे
    • मैं पहले ऋषभदेव (आदिनाथ) की वंदना करता हूँ,
    • फिर अजीतनाथ, संभवनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ,
    • पद्मप्रभु, सुपार्श्वनाथ और चंद्रप्रभु जिनेंद्र की वंदना करता हूँ।

    अर्थ: इस गाथा में पहले आठ तीर्थंकरों के नाम लेकर उनकी वंदना की गई है।

    ---

    3.

    सुविहिं च पुप्फ‑दंतं, सीअल‑सिज्जंस‑वासु‑पुज्जं च विमल‑मणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि
    • मैं सुवीरस्वामी (सुवीरनाथ / पुष्पदंत),
    • शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ (या शशिनाथ), वासुपूज्यस्वामी,
    • विमलनाथ, अनंतनाथ जिनेंद्र की वंदना करता हूँ,
    • साथ ही मैं उनके धर्म और शांति की भी वंदना करता हूँ।

    अर्थ: यहाँ अगले छह तीर्थंकरों का नाम लेकर, उनके पवित्र धर्म और शांति‑स्वरूप को नमस्कार किया गया है।

    ---

    4.

    कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणि‑सुव्वयं नमि‑जिणं च वंदामि रिट्ठ‑नेमिं, पासं तह वद्धमाणं च
    • मैं कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ,
    • मुनिसुव्रतनाथ, नामिनाथ जिनेंद्र की वंदना करता हूँ,
    • और मैं ऋषभदेव की तरह ऋषभ‑नेमि नहीं, बल्कि ऋषभ के बाद वाले
    • अरिहंत भगवान नेमिनाथ (ऋषभ‑नेमि → ऋषभ के वंशज नेमि) की,
    • फिर पार्श्वनाथ और उसके बाद वर्धमान महावीर की वंदना करता हूँ।

    अर्थ: यहाँ शेष आठ तीर्थंकरों – 17वें से 24वें (कुंथुनाथ से लेकर भगवान महावीर) – की वंदना की गई है।

    ---

    5.

    एवं मए अभिथुआ, विहुय‑रय‑मला पहीण‑जर‑मरणा चउ‑वीसं पि जिणवरा, तित्थ‑यरा मे पसीयंतु
    • इस प्रकार मैंने (भक्ति‑भाव से) उनकी स्तुति की है,
    • जो राग‑द्वेष रूप मल (कषाय) को छोड़ चुके हैं,
    • जिन्होंने जन्म‑मरण (जरामरण) रूप दुखों का नाश कर दिया है,
    • वे चौबीसों के चौबीस जिनवर तीर्थंकर मुझ पर कृपा दृष्टि करें।

    अर्थ: मैं उन चौबीस तीर्थंकरों की भक्ति करता हूँ, जिन्होंने राग‑द्वेष और जन्म‑मरण को जीत लिया है; वे मुझ पर प्रसन्न हों।

    ---

    6.

    कित्तिय‑वंदिय‑महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा आरुग्ग‑बोहि‑लाभं, समाहि‑वर‑मुत्तमं दिंतु
    • जो इस लोक के श्रेष्ठ सिद्ध हैं,
    • जिनकी कीर्ति की गई है, जिन्हें वंदन और महिमा दी गई है,
    • वे मुझे आरोग्य (स्वास्थ्य), बोधि‑लाभ (सम्यग्दर्शन‑ज्ञान),
    • और उत्तम प्रकार की समाधि (आंतरिक शांति‑स्थित) प्रदान करें।

    अर्थ: मैं सिद्ध परमात्माओं से प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे अच्छा स्वास्थ्य, सही दर्शन‑ज्ञान और सर्वोत्तम समाधि प्रदान करें।

    ---

    7.

    चंदेसु निम्मल‑यरा, आइच्चेसु अहियं पयास‑यरा सागर‑वर‑गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु
    • जो चाँद की तरह निर्मल हैं,
    • जो सूरज की तरह तेजस्वी हैं,
    • जो समुद्र की तरह गहरे (गंभीर) हैं – ऐसे सिद्ध भगवान
    • मुझे भी सिद्ध‑पद (मोक्ष‑सिद्धि) प्रदान करें / उसकी ओर उन्मुख करें।

    अर्थ: निर्मल, प्रकाशमान और अतिगंभीर सिद्ध परमात्मा मुझे भी मोक्ष‑मार्ग पर स्थिर करें और अंतिम सिद्धि देनेवाले हों।

    ---

    संक्षिप्त सार

    • लोगस्स सूत्र में चौबीसों तीर्थंकरों की नाम‑समेत वंदना है।
    • बाद की गाथाओं में सिद्धों की वंदना और उनसे
    - राग‑द्वेष का नाश, - जन्म‑मरण से मुक्ति, - स्वास्थ्य, सम्यग्दर्शन‑ज्ञान और समाधि, - अंत में मोक्ष रूप सिद्धि की प्रार्थना की गई है।

    ---

    परम्परा (श्वेताम्बर / दिगम्बर)

    • यह लोगस्स सूत्र मुख्य रूप से श्वेताम्बर आगमों में मिलता है और अवश्यकों (प्रतिक्रमण आदि) में प्रतिदिन पढ़ा जाता है।
    • दिगम्बर परम्परा में भी चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति के लिए चतुर्विंशति‑स्तवन आदि पाठ हैं; शब्द थोड़ा अलग हो सकता है पर भाव एक ही है – चौबीस तीर्थंकरों और सिद्धों की भक्ति और मोक्ष‑कामना।

    लोगस्स पर और सामग्री, पाठ व अर्थ आप यहाँ देख सकते हैं:

    About Jain Knowledge

    JainGPT by JainKnowledge.com is India’s first AI-powered platform dedicated entirely to Jainism. Here, you can ask any question related to Jain Dharma — from rituals and history to philosophy and daily practices — and receive instant, accurate answers rooted in Jain principles.

    Our mission is to make Jain knowledge accessible to all, especially the next generation, through the power of technology. Whether you're a curious student or a lifelong seeker, JainGPT is your trusted digital guide for all things Jain.

    Authentic Jain knowledge, made simple and accessible for every generation.
    Follow Us
    Facebook ↗ Instagram ↗

    Stay connected for Jain knowledge, insights and community updates.

    Jain Knowledge

    JainGPT by JainKnowledge.com is India’s first AI-powered platform dedicated entirely to Jainism. Ask questions related to Jain Dharma, rituals, history, philosophy and daily practices, and receive answers rooted in Jain principles.

    Explore
    • JainGPT
    • Jain Directory
    • Jain Media
    • Advertise With Us
    • Disclaimer
    Our Mission

    Our mission is to make Jain knowledge accessible to all, especially the next generation, through the power of technology. Whether you're a curious student or a lifelong seeker, JainGPT is your trusted digital guide for all things Jain.

    info@jainknowledge.com Online support
    Mumbai India

    Copyright © 2026 Jain Knowledge

    Created by Katalyst Corp.