6. सम्यग्ज्ञान प्राप्ति के लिए किनका अभ्यास करना चाहिए ?
सम्यग्ज्ञान (सही / यथार्थ ज्ञान) प्राप्त करने के लिए जैन धर्म में मुख्य रूप से इनका अभ्यास बताया गया है:
- श्रवण (सुनना)
- जिनवाणी, आगम और तत्त्वज्ञान को योग्य गुरु, आचार्य आदि से श्रद्धा से सुनना।
- मनन (विचार करना)
- जो सुना है, उस पर बार‑बार शांत चित्त से विचार करना – जीव, अजीव, पुण्य‑पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, मोक्ष आदि तत्त्वों का विचार।
- निधिध्यासन / ध्यान
- आत्मा की शुद्ध अवस्था पर, स्व‑पर के भेद पर, कर्म‑बंधन और मोक्ष के मार्ग पर गहन ध्यान लगाना।
- आचरण की शुद्धि
- झूठ, हिंसा, चोरी, अन्याय, अत्यधिक परिग्रह आदि को छोड़कर संयमित, साधु‑स्वभाव का आचरण रखना; - क्योंकि अशुद्ध आचरण सम्यग्ज्ञान को बाधित करता है।
देव‑शास्त्र‑गुरु में सम्यक् श्रद्धा रखते हुए, इनका नियमित अभ्यास करने से मिथ्यात्व (गलत मान्यता) दूर होता है और सम्यग्ज्ञान की उत्पत्ति में सहायता मिलती है। दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों परंपराएँ मूलतः इन्हीं साधनों (श्रवण‑मनन‑निधिध्यासन और शुद्ध आचरण) को सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति के लिए स्वीकृत मानती हैं।