Nakoda ji mantra stotra stuti
नाकोडा जी के बारे में दो बातें अलग‑अलग याद रखनी ज़रूरी हैं:
- मूल आराध्य – श्री नाकोडा पार्श्वनाथ भगवान (तीर्थंकर)
- शासन देव – श्री नाकोडा भैरव देव (भक्तों के रक्षक देव)
आपने “मंत्र, स्तोत्र, स्तुति” लिखा है, तो संक्षेप में – नाकोडा जी पर परंपरागत रूप से क्या‑क्या बोला जाता है, वह बता रहा हूँ:
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1. नाकोडा जी पर मुख्य जैन मंत्र
(क) नवकार मंत्र / नमोकार मंत्र
यह हर जैन तीर्थ की तरह नाकोडा में भी सबसे पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्र है:ṇमो अरिहंताणं ṇमो सिद्धाणं ṇमो आयरियाणं ṇमो उवज्जायाणं ṇमो लोए सव्वसाहूणं। एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलं॥
सरल अर्थ: मैं अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधुओं को नमस्कार करता हूँ। यह पाँचों का नमस्कार सभी पापों का नाश करने वाला है और सब मंगलों में भी प्रथम मंगल है।
नाकोडा जी में भी सबसे पहले यही मंत्र, फिर अन्य स्तोत्र/स्तुतियाँ बोली जाती हैं।
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2. नाकोडा जी पर बोले जाने वाले प्रसिद्ध स्तोत्र
(क) ऊवसग्गहरं स्तोत्र (उवासग्गहरं)
यह भगवान पार्श्वनाथ का अत्यन्त प्रसिद्ध स्तोत्र है, जो नाकोडा जी पर भी बहुत श्रद्धा से बोला जाता है। इससे कष्ट, रोग, भय आदि दूर करने की भावना से पाठ किया जाता है।प्रारम्भिक पंक्ति (प्राकृत में):
उवसग्गहरं, पशमं मगं, ठाणं हवे जिणवरस्स, सोरं सगरं, कंठकं पवं, जले अण्णंति दुज्जयाणं…
भावार्थ: हे पार्श्वनाथ प्रभु! आपका स्मरण सभी प्रकार के उपसर्ग (कष्ट), रोग, भय, कठिन परिस्थितियों को शान्त करता है और साधक को शान्ति, सुरक्षा और मंगल देता है।
(पूरा स्तोत्र काफ़ी लम्बा है; यदि आपको पूरा पाठ चाहिए तो किसी प्रमाणिक जैन ग्रंथ / पाठ‑पुस्तिका से ही लीजिए, क्योंकि अलग‑अलग पुस्तकों में छोटी‑बड़ी पाठ‑भिन्नताएँ मिलती हैं।)
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3. नाकोडा भैरव देव के स्तवन / आरती / चालीसा
नाकोडा जी में पार्श्वनाथ भगवान के साथ‑साथ नाकोडा भैरव देव की भी विशेष भक्ति होती है। उनके लिए अलग‑अलग स्थानों पर इन प्रकार की रचनाएँ मिलती हैं:
- श्री नाकोडा भैरव जी की आरती
- नाकोडा भैरव चालीसा
- नाकोडा भैरव जी के भजन / स्तवन / स्तुति
इनकी पंक्तियाँ स्थान, परंपरा और पुस्तक के अनुसार थोड़ा‑थोड़ा बदल जाती हैं, इसलिए किसी एक “अधिकृत आगमिक” पाठ की तरह निश्चित रूप से सब जगह एक‑सा मान्य टेक्स्ट नहीं है, बल्कि लोकभक्ति‑आधारित स्तुतियाँ हैं।
इसी कारण से, मैं यहाँ पूरी आरती/चालीसा की पंक्तियाँ नहीं दे रहा, ताकि किसी विशेष जगह पर बोले जाने वाले वास्तविक पाठ से अंतर न हो और अशुद्धि न हो। सबसे अच्छा यह है कि:
- सीधे नाकोडा तीर्थ ट्रस्ट से प्रकाशित आरती/चालीसा‑पुस्तिका लें
- या अपने गृह‑स्थान की जैन समाज में जो “नाकोडा भैरव आरती / चालीसा” बोली जाती है, वही अधिकृत मानी जाए
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4. नाकोडा जी पर साधारण पूजन‑क्रम (साधक के लिए सरल मार्गदर्शन)
आप घर पर या तीर्थ पर नाकोडा जी की भावना से साधारण पूजा ऐसे कर सकते हैं:
- नवकार मंत्र – 9, 21 या 108 बार
- ऊवसग्गहरं स्तोत्र – 1 या 3 बार (पार्श्वनाथ प्रभु की शरण का भाव)
- पार्श्वनाथ प्रभु का कोई भी स्तवन / भक्ति गीत (जैसे – “पार्श्व प्रभु तुम जो हो मेरे…” आदि)
- अंत में यदि आपकी परंपरा में हो तो नाकोडा भैरव जी की आरती / स्तुति गा सकते हैं –
लेकिन याद रखें, भाव हमेशा ऐसे रहे कि - मूल आराध्य तीर्थंकर हैं (पार्श्वनाथ भगवान) - भैरव देव केवल शासन‑देव / रक्षक हैं, जिनकी भी पूजा भगवान की आज्ञा व मर्यादा में मानी जाती है
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5. श्वेताम्बर – दिगम्बर दृष्टि
- तीर्थंकर पार्श्वनाथ की आराधना, नवकार मंत्र, ऊवसग्गहरं, भक्तामर आदि –
- नाकोडा भैरव जैसे शासन‑देवों की विशेष भक्ति – अधिकतर श्वेताम्बर परंपरा (विशेषकर राजस्थान‑मारवाड़ क्षेत्र) में विकसित रूप में मिलती है।
- दिगम्बर परंपरा में भी तीर्थ‑क्षेत्रों से जुड़े यक्ष‑यक्षिणी‑आराधना के रूप मिलते हैं, परंतु मुख्य ज़ोर सदा तीर्थंकर और मूल आगमिक स्तोत्रों पर ही रहता है।
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संक्षेप में: नाकोडा जी के लिए सबसे शुद्ध और सार्वभौम आराधना – नवकार मंत्र, ऊवसग्गहरं स्तोत्र, और अन्य मूल जैन स्तोत्र (भक्तामर, कूनिक, आदि) हैं। नाकोडा भैरव जी की आरती/चालीसा लोकभक्ति की रचनाएँ हैं, जिनका सही पाठ अपने स्थानीय जैन समाज या नाकोडा तीर्थ की अधिकृत पुस्तकों से लेना ही उचित है।