Jain shwetambar nav grah mantra
यहाँ श्वेताम्बर परम्परा में प्रचलित जैन नवग्रह (नवग्रह शान्ति) जप-मन्त्र सरल रूप में दिये जा रहे हैं। इनमें प्रत्येक ग्रह को किसी तीर्थंकर‑भगवान से जोड़ा जाता है:
- सूर्य (Sun) – श्री पद्मप्रभ भगवान
`ॐ पद्मप्रभाय नमः।`
- चन्द्र (Moon) – श्री चन्द्रप्रभु भगवान
`ॐ चन्द्रप्रभाय नमः।`
- मंगल (Mars) – श्री वासुपूज्य भगवान
`ॐ वासुपूज्याय नमः।`
- बुध (Mercury) – श्री शांतिनाथ भगवान
`ॐ शांतिनाथाय नमः।`
- गुरु (Jupiter) – श्री आदिनाथ / ऋषभदेव भगवान
`ॐ आदिनाथाय नमः।` (कई स्थान पर – `ॐ ऋषभदेवाय नमः।` भी लिया जाता है)
- शुक्र (Venus) – श्री सुविधिनाथ भगवान
`ॐ सुविधिनाथाय नमः।`
- शनि (Saturn) – श्री मुनिसुव्रत भगवान
`ॐ मुनिसुव्रताय नमः।`
- राहु – श्री नेमिनाथ भगवान
`ॐ नेमिनाथाय नमः।`
- केतु – श्री मल्लिनाथ / श्री पार्श्वनाथ भगवान
बहुत‑सी परम्पराओं में दोनों का स्मरण करते हैं: `ॐ मल्लिनाथाय नमः।` `ॐ पार्श्वनाथाय नमः।`
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कुछ महत्वपूर्ण बातें
- अलग‑अलग जैन संघों/गृहस्थ परम्पराओं में इन मन्त्रों के आगे पीछे “ॐ ह्रीं श्रीं … नमः”, या “ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं … नमः स्वाहा” जैसे बीजाक्षर भी जोड़े जाते हैं।
- दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों में मूल भाव एक ही है: ग्रहों की शान्ति के लिए तीर्थंकर भगवान की आराधना; शब्दों में थोड़ा अन्तर हो सकता है, सिद्धान्त में नहीं।
- जैन दृष्टि से असली “ग्रहशान्ति” तभी मानी जाती है जब हम
यदि आप इन्हें रोज करना चाहें तो साधारण नियम यह रखा जाता है कि
- पहले एक बार नवकार मंत्र
- फिर जिस ग्रह की शान्ति चाहिये, उसके सम्बंधित तीर्थंकर का यह छोटा मंत्र कम से कम 108 बार जपा जाता है।