आर्त ध्यान कितने व कौन से भेद हैं
आर्त ध्यान के 4 भेद माने गए हैं:
- अनिष्ट-संयोगज आर्त ध्यान
जो चीज़ हमें बिलकुल पसंद नहीं है (अप्रिय/अनिष्ट), उसके साथ संयोग हो जाए और उसे दूर करने की चिंता, घबराहट, क्लेश का जो चिन्तन चलता रहे – वह अनिष्ट‑संयोगज आर्त ध्यान है।
- इष्ट-वियोगज आर्त ध्यान
जो चीज़, व्यक्ति, पद, धन आदि हमें बहुत प्रिय (इष्ट) है, उससे वियोग हो जाए, या वियोग का डर रहे, और उसकी ही चिन्ता–मोह–शोक में लगे रहना – यह इष्ट‑वियोगज आर्त ध्यान है।
- वेदना‑जनित (परिषद्‑जनित) आर्त ध्यान
शरीर की बीमारी, दर्द, कष्ट, गर्मी–सर्दी आदि से जो पीड़ा महसूस हो, और उसी वेदना को दूर करने के बारे में ही मन बार‑बार सोचता रहे – यह वेदना‑जनित आर्त ध्यान है।
- निदान‑जनित आर्त ध्यान
भविष्य के भोग, सुख, पद, सम्मान, इन्द्रिय‑सुख आदि पाने की तीव्र तृष्णा और उसकी प्राप्ति के उपायों का बार‑बार चिन्तन – यह निदान‑जनित आर्त ध्यान है।
संक्षेप में: दुःख, कमी, वियोग या भविष्य के भोग की लालसा में व्याकुल होकर किया जाने वाला चिन्तन – यही आर्त ध्यान है। दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों परम्पराएँ मूलतः इन्हीं चार भेदों को मानती हैं, नामों में थोड़ा अंतर हो सकता है, अर्थ एक ही है।