Manibhara veer stotra
नीचे प्रचलित “श्री मणिभद्र वीर स्तोत्र” (संस्कृत) और उसका सरल अर्थ दिया है।
---
मूल स्तोत्र (संस्कृत)
१ ऊँ ह्रीँ श्रीँ माणिभद्र इन्द्र ! सर्वमंगलकारकः । प्रत्यक्ष दर्शनं देहि मच्छ्रद्धा प्रीति‑भक्तितः ॥१॥
२ विद्यां देहि धनं देहि पुत्रं च पुत्रीकाम् । कीर्तिं देहि यशो देहि प्रतिष्ठां देहि च स्त्रियम् ॥२॥
३ सर्वं मे वाञ्छितं देहि, सुखं शान्ति प्रदेहि मे । वादे विवादे युद्धे च, जयं मे कुरु सर्वतः ॥३॥
४ राज्यं च राज्यमानं च बलबुद्धिं प्रवर्द्धय । गर्भस्थबालकं रक्ष, रोगेभ्यो रक्ष बालकान् ॥४॥
५ आधिं व्याधिं विपतिं च, महाभीतिं विनाशय । घातकेभ्यश्च मां रक्ष, रात्रौ दिवा च सर्वदा ॥५॥
६ अपमृत्यु प्रयोगाणां, नाशतो रक्ष मे सदा । दैवीसंकटतोरक्ष, आकस्मिकविपत्तितः ॥६॥
७ शाकिनी‑भूत‑वैतालान् राक्षसांश्च निवारय । वने रणे गृहे ग्रामे, रक्ष राज्यसभादिषु ॥७॥
८ इष्टसिद्धिं महासिद्धिं, जयलक्ष्मी विवर्द्धय । तपागच्छ‑नायकं ऊँ ह्रीँ श्रीँ माणिभद्रवीरं ॥८॥
९ नमोस्तु ते मम शान्ति तृष्टिं पुष्टिं ऋद्धिं वृद्धिं । सिद्धिं समृद्धिं वश्यं रक्षां च, कुरु कुरु स्वाहा ॥९॥
---
बहुत सरल अर्थ (arth – संक्षेप में)
- श्लोक १ – हे मणिभद्र इन्द्र देव! आप सब प्रकार का शुभ देने वाले हैं; श्रद्धा, प्रेम और भक्ति से मैं आपको नमस्कार करता हूँ, मुझे आपका प्रत्यक्ष (अनुभव/कृपा) दर्शन कराइए।
- श्लोक २ – मुझे शिक्षा, धन, संतान (जहाँ उचित हो), अच्छी कीर्ति, यश, समाज में सम्मान और सद्गुणों से युक्त जीवन प्रदान कीजिए।
- श्लोक ३ – मेरी सभी शुभ इच्छाएँ पूर्ण हों, मुझे सुख और शान्ति मिले; वाद‑विवाद या संघर्ष की स्थितियों में मेरी रक्षा कर विजय दीजिए।
- श्लोक ४ – मेरे राज्य/काम‑काज का बल और बुद्धि बढ़े; गर्भ में पल रहे शिशु और सभी बच्चों को रोगों से बचाइए।
- श्लोक ५ – मानसिक चिन्ता, शारीरिक रोग, कठिन आपदा और बड़े‑बड़े भयों को दूर कीजिए; हमेशा, दिन‑रात मुझे घातक शत्रुओं आदि से रक्षा दीजिए।
- श्लोक ६ – अकाल‑मृत्यु और नकारात्मक प्रयोगों से मुझे बचाइए; दैवी/अचानक आने वाले संकटों और आकस्मिक दुर्घटनाओं से रक्षा कीजिए।
- श्लोक ७ – शाकिनी, भूत, प्रेत, राक्षस जैसे विघ्नों को दूर कीजिए; वन, रणभूमि, घर, गाँव, राजदरबार – हर स्थान पर मेरी रक्षा कीजिए।
- श्लोक ८ – मुझे इष्ट‑सिद्धि (शुभ कार्यों की सिद्धि), महान सफलता और स्थिर विजय‑लक्ष्मी प्रदान कीजिए; तपागच्छ के नायक, हे मणिभद्र वीर! आपको नमस्कार है।
- श्लोक ९ – मैं आपको नमस्कार करता हूँ; मेरे लिए शान्ति, तृप्ति, पोषण, उन्नति, सिद्धि, समृद्धि, वश्यता (अर्थात परिस्थितियों पर संयम‑नियंत्रण) और सुरक्षा स्थापित कीजिए।
---
परम्परा के बारे में
- यह स्तोत्र मुख्यतः श्वेताम्बर (विशेषकर तपागच्छ) परम्परा में मणिभद्र वीर के पूजन में बोला जाता है।
- दिगम्बर समाज में भी क्षेत्रपाल‑देव के रूप में मणिभद्र की मान्यता कुछ क्षेत्रों में है, परन्तु यह विशेष स्तोत्र उतना प्रचलित नहीं; मूल सिद्धान्त दोनों में समान है – अरिहन्त‑सिद्ध की पूजा सर्वोच्च, और ऐसे देव केवल रक्षक (क्षेत्रपाल/यक्ष) माने जाते हैं, मोक्षदाता नहीं।
मणिभद्र वीर के मन्त्र और जीवन‑कथा के बारे में और सरल जानकारी आप यहाँ पढ़ सकते हैं