समुद्र में पानी बहुत है तो संसार रूपी समुद्र में कौन सा पानी अधिक है
संसार की तुलना अक्सर “संसार रूपी समुद्र” से की जाती है। समुद्र में तो केवल भौतिक पानी है, लेकिन संसार रूपी समुद्र में:
- कर्मों का जल
- मोह (अज्ञान) का जल
- राग‑द्वेष और दुखों का जल
इन सबका "जल" असंख्य‑अपरिमित माना गया है।
जैन दृष्टि से कहा जाए तो: समुद्र का पानी सीमित है, पर जीव ने अनादि काल से जो कर्म बाँधे हैं, उनसे उत्पन्न दुख‑अश्रु, चिंता, भय, लोभ इत्यादि का "जल" कहीं अधिक है। इसीलिए इसे “संसार‑सागर” कहा जाता है – जहाँ डूबोने वाला जल कर्म और मोह है, न कि वास्तविक पानी।