समुद्र में पानी अधिक है तो संसार रूपी समुद्र में पानी के बारे में किस सूत्र में आया है
जितना आप वाक्य बोल रहे हैं – “समुद्र में पानी अधिक है, तो संसार रूपी समुद्र में … (पानी/दुःख आदि)…” – ऐसे शब्दों वाला सीधा, प्रसिद्ध जैन सूत्र मुझे किसी प्रमाणिक आगम / स्तोत्र में नहीं मिलता।
जैन शास्त्रों में तो यह उपमा बार‑बार आती है कि:
- संसार को “संसार‑सागर / संसार‑समुद्र” कहा गया है,
- और उसमें डूबे हुए जीव को तैरते हुए या डूबते हुए नाव / बेड़ा / तीर्थंकर / धर्म के सहारे से पार कराने की बात आती है।
उदाहरण के लिए:
- “अपार संसार समुद्दपारं …” यह पंक्ति कल्लाणकंदं स्तुति (कल्लाणकंदं सूत्र) की दूसरी पंक्ति में आती है, जिसमें संसार को अपार समुद्र कहा गया है और जिन्नेंद्र भगवान को उस समुद्र के पार लगाने वाले के रूप में नमस्कार किया गया है।
संक्षेप में:
- ऐसा कोई प्रसिद्ध जैन सूत्र, जिसमें शाब्दिक रूप से “समुद्र में जितना पानी है, संसार रूपी समुद्र में…” जैसा वाक्य हो, मुझे प्रमाणिक रूप से नहीं मिलता।
- सम्भव है आपने यह पंक्ति किसी प्रवचन, काव्य, या भजन में सुनी हो, जहाँ साधु‑साध्वी या प्रवचनकार ने उदाहरण के रूप में यह बात कही हो – पर वह मूल आगमिक सूत्र नहीं होगा।
इसलिए मैं किसी विशेष “सूत्र‑नाम” से इसे जोड़कर बताने की पुष्टि नहीं कर सकता; केवल इतना कह सकता हूँ कि संसार‑समुद्र की उपमा बहुत‑से जैन ग्रन्थों और स्तोत्रों में मिलती है, पर आपके बताए वाक्य जैसा सटीक वाक्य आगम‑सूत्र के रूप में प्रसिद्ध नहीं है।