ब्रह्मचर्य की नव बाड़
“ब्रह्मचर्य की नव बाड़” का अर्थ है – ब्रह्मचर्य (शुद्ध चरित्र / काम–संयम) की रक्षा के लिए बनाई गई 9 सुरक्षा–दीवारें या कड़े नियम। जितना सख्ती से इनका पालन होगा, ब्रह्मचर्य उतना सुरक्षित रहेगा।
जैन आचार्यों द्वारा बताई गई नव बाड़ साधुओं–साध्वियों के लिए मुख्य हैं, पर गृहस्थ भी अपनी क्षमता अनुसार इन्हें अपनाकर बहुत लाभ ले सकते हैं।
ब्रह्मचर्य की 9 बाड़ (संक्षेप में)
- अलग निवास
ब्रह्मचारी पुरुष–स्त्री–नपुंसक से मुक्त, अकेले और शांत स्थान में रहे; यानी विपरीत लिंग के साथ रहना, साथ सोना–जागना न हो।
- अकेला पुरुष–अकेली स्त्री की गोपनीय बातचीत नहीं
न अकेला पुरुष अकेली स्त्री से अकेले में लम्बी बात करे, न अकेली स्त्री अकेले पुरुष से; यहाँ तक कि धर्मकथा भी अकेले–अकेले में न कही जाए।
- विपरीत लिंग को टकटकी लगाकर न देखना
स्त्री–पुरुष एक–दूसरे के नेत्र, मुख, शरीर आदि अंगों को प्रेम या आकर्षण से, बार–बार, ध्यान से न देखें।
- एक ही आसन / ताज़ा उपयोग किए आसन पर न बैठना
ब्रह्मचारी पुरुष स्त्री के साथ एक ही आसन पर न बैठे, न ही स्त्री द्वारा अभी–अभी उपयोग किए आसन पर तुरन्त बैठे (कुछ समय का अंतर रखा जाता है), ताकि सूक्ष्म आकर्षण से भी बचा जा सके।
- कुडंतर (किण्डंतर) का त्याग
जहाँ बस एक दीवार के अंतर से स्त्री–पुरुष की काम–क्रीड़ा के शब्द सुनाई पड़ते हों, ऐसे घर, कमरा, स्थान को त्याग देना – वहाँ रहना भी ब्रह्मचर्य के लिए हानिकारक माना गया है।
- पुराने भोगों की स्मृति से बचना
पहले के काम–संबंध, भोग–विलास, स्त्री–संग आदि के सुख की यादें बार–बार न लाना, न उनमें मन ही मन डूबे रहना।
- उत्तेजक / अतिस्निग्ध आहार का त्याग
दूध, दही, घी, मिठाई, तैलीय, बहुत स्वादिष्ट, बहुत पौष्टिक या तामसिक आहार जो शरीर में विकार और काम–वृद्धि करे – उससे यथासंभव बचना या मर्यादित रखना।
- अत्यधिक रूक्ष (लुख्खा) आहार भी न लेना
सिर्फ बहुत सूखा, कड़ा, रूक्ष भोजन अधिक मात्रा में भी शरीर को असंतुलित करके मन को चिड़चिड़ा बना देता है; इसलिए यहाँ भी मध्यम मार्ग – न बहुत तैलीय, न बहुत सूखा – संयमी, सरल आहार।
- शरीर–शृंगार और सजावट का त्याग
केश, नख आदि को फैशन से, आकर्षक ढंग से न सजाना, इत्र, चंदन, मेकअप आदि से देह–सौन्दर्य न बढ़ाना, अनावश्यक स्नान–विलेपन, अलंकार, गहने आदि से खुद को आकर्षक न बनाना – ताकि न स्वयं का मान बढ़े, न दूसरों में आकर्षण जगे।
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परम्परा के मत (दिगम्बर / श्वेताम्बर)
- दोनों परम्पराएँ ब्रह्मचर्य को अत्यन्त ऊँचा धर्म मानती हैं
- शास्त्रों के नाम, गिनती या भाषा में थोड़ा अंतर हो सकता है,
यह “नव बाड़” बाहरी नियम लगते हैं, पर असली उद्देश्य अंदर के काम–विचार को शांत करना है। बाहर की सावधानी ही भीतर की शुद्धि में सहायक बनती है।