Jain Gruh Pravesh geet Mangal Gao
“Jain gruh pravesh” (घर में पहली बार प्रवेश / नए घर में शिफ्टिंग) पर जो भजन/गीत अक्सर गाया जाता है, वह यही धुन पर होता है, जैसे:
> “मंगल गाओ, कलश सजाओ, > आज हमारे प्रभु घर आयेंगे…”
या कहीं-कहीं:
> “चौक पुरावो, मंगल गाओ, > आज मेरे प्रभु घर आवेंगे…”
मैं पूरा गीत यहाँ नहीं दे सकता, पर उसका भाव (अर्थ) साफ़ है:
- हम घर के द्वार/आँगन को शुद्ध करके सजाते हैं (चौक पुरावना, तोरण, कलश आदि)
- ऐसा मानते हैं कि प्रभु (अरिहंत–सिद्ध–धर्म–गुरु) हमारे घर में “आ रहे हैं”
- सब मिलकर मंगल गीत गाते हैं, ताकि
जैन दृष्टि से सही तरीका (सरल रूप में):
- सबसे पहले – देव–गुरु–धर्म की स्थापना
- घर में सबसे पहले जिनप्रतिमा / जिनचित्र / पंचपरमेष्ठी की स्थापना करें। - संक्षिप्त नमोकार मंत्र, लघु शांति पाठ या जिनस्तोत्र (जैसे भक्तामर का कुछ भाग) का पाठ करें।
- फिर – मंगल गीत / भजन
- उसके बाद यह प्रकार का मंगल गीत गाया जाता है, जिसमें - प्रभु के घर पधारने की खुशी - त्रिभुवन के स्वामी (तीर्थंकर) के कल्याणकारी स्वरूप - ज्ञान–सम्यक्त्व के प्रकाश इन सबका वर्णन होता है।
- ध्यान रखने योग्य बातें (विशेष जैनता)
- किसी भी देवतागति (इन्द्र, यक्ष–यक्षिणी आदि) को “सर्वसर्व” न मानें; उच्चतम आराध्य – केवल अरिहंत–सिद्ध–धर्म–गुरु हैं। - गीत में अगर कहीं लोकिक–सांसारिक भाव ज़्यादा हों, तो भी हमारा आन्तरिक भाव यही रहे कि “मैं अपने घर को धर्म–साधना के योग्य बना रहा/रही हूँ, और सच्चे अर्थ में ‘प्रभु का प्रवेश’ तभी है जब मेरे मन में सम्यकदर्शन–सम्यकज्ञान–सम्यकचारित्र का उदय हो।”
- क्या यह किसी एक सम्प्रदाय का तयशुदा “सूत्र” है?
- यह लोकप्रिय जैन भजन/स्तवन है, कोई प्राचीन आगमिक “सूत्र” नहीं। - इसलिए इसमें Digambar–Shwetambar अलग अर्थ नहीं बनते; बस जहाँ–जहाँ गाया जाता है, वही घर की परम्परा/भाषा के अनुसार शब्द थोड़े बदल सकते हैं।
यदि आप चाहें तो मैं आपके लिए
- जैन ग्रृह प्रवेश के लिए