कायोत्सर्ग के आगार
कायोत्सर्ग के “आगार” का सीधा‑सा अर्थ है – कायोत्सर्ग की प्रतिज्ञा करते समय जो‑जो देह की अनिवार्य, स्वतः होने वाली क्रियाएँ होती हैं, उन्हें अपवाद (छूट) के रूप में मान लेना, ताकि प्रतिज्ञा भंग न मानी जाए।
कायोत्सर्ग में हम प्रण लेते हैं – “मैं शरीर को बिलकुल स्थिर रखूँगा, न हिलूँगा, न बोलूँगा, न सोच‑विचार भटकाऊँगा।” परन्तु शरीर की कुछ क्रियाएँ अपने‑आप चलती रहती हैं, उन्हें रोका नहीं जा सकता; इन्हें ही कायोत्सर्ग के आगार कहा गया है।
परम्परागत रूप से प्रायः ये आगार माने जाते हैं (शब्द थोड़ा‑बहुत बदल सकते हैं, पर भाव यही है) –
- श्वास लेना (उच्छ्वास)
- श्वास छोड़ना (निःश्वास)
- खाँसी आ जाना
- छींक आ जाना
- जम्हाई (उबासी) आ जाना
- डकार आ जाना
- अपान वायु (पाद/गैस) निकल जाना
- चक्कर आ जाना
- मूर्च्छा/बहुत कमजोरी से बेहोशी‑सी आना
- सूक्ष्म अंग‑चेष्टा (बहुत हल्की, अनजानी हरकतें – जैसे नस फड़कना आदि)
- सूक्ष्म कफ का संचरण (गले/छाती के भीतर की हल्की हलचल)
- सूक्ष्म दृष्टि‑संचार (आँख की बहुत हल्की, अनजानी गति)
मुख्य बात
- इन सब क्रियाओं को आगार इसलिए कहा कि
दिगंबर‑श्वेतांबर मत
- दोनों परम्पराओं में भाव एक‑सा है –
- आगारों की संख्या/शब्दावली में थोड़ा अंतर मिल सकता है, पर
संक्षेप में: कायोत्सर्ग के आगार = वे अनिवार्य, अपने‑आप होने वाले देह‑गत कार्य, जिनकी छूट रखकर भी साधक देह‑भान छोड़कर आत्म‑भाव में स्थिर रह सकता है।