कायोत्सर्ग के 12 आगारों के मूल शब्द
कायोत्सर्ग के १२ आगारों के मूल (प्राकृत) शब्द यह हैं:
- अण्णत्थ ऊससिएणं
- णीससिएणं
- खासिएणं
- छीएणं
- जंभाइएणं
- उड्डुएणं
- वाय-निसग्गेणं
- भमलीए
- पित्त-मुच्छाए
- सुहुमेहिं अंग-संचालेहिं
- सुहुमेहिं खेळ-संचालेहिं
- सुहुमेहिं दिट्ठि-संचालेहिं
बहुत सरल भाषा में, इनका भाव यही है कि कायोत्सर्ग करते समय सिर्फ़ इतनी अनिवार्य देह-गतियाँ (साँस लेना–छोड़ना, खाँसी, छींक, जम्हाई, डकार, हलका अंग‑संचार आदि) की छूट है; इनके अतिरिक्त अगर और कोई देह‑चेष्टा की, तो कायोत्सर्ग का भंग माना जाता है।
इन्हीं १२ को “कायोत्सर्ग के १२ आगार” कहा जाता है।