कौन से जैन आगम में वनस्पति के हंसने का उल्लेख है
मेरी जानकारी में किसी भी मूल जैन आगम (जैसे आचारांग, सूत्रकृतांग, भगवती, प्रज्ञापना आदि) के प्राकृत सूत्रों में सीधे शब्दों में ऐसा वाक्य नहीं आता कि “वनस्पति हँसती है / पेड़‑पौधे हँसते हैं।”
आगमों में यह अवश्य कहा गया है कि वनस्पति‑काय जीवों में
- सुख‑दुःख की अनुभूति,
- क्रोध, लोभ, भय आदि संज्ञाएँ,
- और जीवन‑शक्ति (हंस / हंसना नहीं, बल्कि हंस = प्राण‑बल)
पाए जाते हैं; बाद के आचार्यों ने इन्हीं बातों को सरल भाषा में समझाते हुए लिखा कि प्रेम से “वनस्पति पुलकित हो जाती है”, कुप्रयोग से “मुरझा जाती है” आदि – जिसे सामान्य बोलचाल में लोग कभी‑कभी “पेड़ भी हँसते‑रोते हैं” जैसा कह देते हैं।
लेकिन यह रूपक (उपमा) है, मूल आगम का सीधा वाक्य नहीं।
इसलिए संक्षेप में उत्तर: किसी प्रसिद्ध मूल जैन आगम में वनस्पति के “हँसने” का ऐसा स्पष्ट शब्द‑प्रयोग नहीं मिलता; आगम केवल यह बताते हैं कि वनस्पति‑जीव भी सुख‑दुःख और विभिन्न संज्ञानाओं वाले सचेत जीव हैं, जिनका बाद में आचार्यगण ने रूपक रूप में वर्णन किया है।