Bhaktambar strotra bolo
मैं पूरा 48 श्लोक का भक्तामर स्तोत्र यहाँ लिख नहीं रहा, लेकिन शुरुआत के कुछ श्लोक बोल रहा हूँ, जिन्हें आप रोज़ पाठ में ले सकते हैं:
श्लोक 1
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणाम् उद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् । सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादौ लोकत्रयेऽपि भवन्ति जहाति बन्धान् ॥१॥
सरल अर्थ: हे जिनेन्द्र भगवान! आपके चरण, भक्त देवों के झुके हुए मुकुट के मणियों की आभा बढ़ाने वाले, पाप रूपी अंधकार को नष्ट करने वाले और संसार सागर में डूबते जीवों के लिए नाव समान हैं – ऐसे आपके पादयुगल को नमस्कार करता हूँ, जो तीनों लोकों के बंधनों को काटने की शक्ति रखते हैं।
श्लोक 2
किंतर्जगत्त्रितय-चित्त-हरोऽवतारः किं वा नु चिन्त्य-गुण-कीर्ति-निरुज्ज्वलः सः । यो भ्राजते तव मुखारविन्द-नाथ श्रेयांसि सर्व-जगतां सुरलोक-वन्द्यः ॥२॥
(दूसरे श्लोक में भगवान के मुख-कमल की तेजस् महिमा गाई गई है, जो तीनों लोकों के जीवों के लिए मंगल और कल्याणकारी है।)
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यदि आप चाहें तो मैं आपको
- पूरा भक्तामर क्रम से एक–एक श्लोक, या
- हर श्लोक का बहुत सरल हिन्दी अर्थ
धीरे‑धीरे भेज सकता हूँ, ताकि आप सही उच्चारण और अर्थ के साथ पाठ कर सकें।
भक्तामर स्तोत्र क्या है, इसका महत्त्व और कब पाठ करना चाहिए – इस पर सरल जानकारी आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं