Uvassagaharam meaning, and story
“Uvassagaharam” = “Uvasagga + haram”
- Uvasagga (Upsarg) = संकट, बाधा, पीड़ा, कष्ट, रोग, विपरीत ग्रह आदि
- Haram = हरने वाला, नष्ट करने वाला
So “Uvassagaharam Stotra” का अर्थ है – वह स्तोत्र जो सभी उपसर्ग और कष्टों को हर ले।
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1. संक्षेप में अर्थ (Meaning)
यह स्तोत्र आचार्य भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित है, और २३वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति है। मुख्य भाव:
- भगवान पार्श्वनाथ सब प्रकार के उपसर्ग, रोग, ग्रह-बाधा, विष, भय आदि का नाश करने वाले हैं।
- जो उन्हें श्रद्धा से स्मरण करता है, उसके कर्मजनित कष्ट हल्के पड़ते हैं, मन शांत होता है, और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग साफ होता है।
- यह स्तोत्र विशेषतः सुरक्षा, संकट-निवारण और आध्यात्मिक उत्थान के लिए पढ़ा जाता है।
आप पूरा पाठ और विस्तृत अर्थ यहाँ देख सकते हैं: Uvasaggaharam Sutra (पाठ) अर्थ और समझ
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2. मुख्य कथा (Story behind Uvassagaharam)
परंपरागत जैन कथा इस प्रकार बताई जाती है:
- दो शक्तिशाली साधु – भद्रबाहु और वराहमिहिर
- आचार्य भद्रबाहु स्वामी बहुत प्रभावशाली, विद्वान और सिद्धीवान जैन मुनि थे। - उनके ही परिवार/परिचय में एक और विद्वान मुनि वराहमिहिर थे। - जब आचार्य पद और मान–सम्मान भद्रबाहु स्वामी को अधिक मिलने लगा, तो वराहमिहिर के मन में ईर्ष्या और क्रोध आ गया।
- वराहमिहिर का द्वेष और भविष्य जन्म
- इस ईर्ष्या के कारण उनके भाव बहुत अशुभ हो गए। - आगे चलकर मृत्यु के बाद वे व्यंतर देव (एक प्रकार के देव जो निकृष्ट वासनाओं से ग्रस्त होते हैं) बन गए। - उस अवस्था में भी ईर्ष्या और क्रोध के कारण वे जैनों और जैन धर्म के प्रति विरोधी रहे।
- जैनों पर भारी उपसर्ग
- कथा के अनुसार, उस व्यंतर देव रूप में वराहमिहिर ने जैनों को विभिन्न प्रकार के उपसर्ग (कष्ट, बाधाएँ, रोग, विपत्ति) देना शुरू कर दिया। - समाज में बहुत कष्ट, डर और अशांति फैल गई; लोग समझ नहीं पा रहे थे कि ये सब क्यों हो रहा है।
- लोगों की विनती और भद्रबाहु स्वामी की करुणा
- दुखी होकर लोग आचार्य भद्रबाहु स्वामी के पास गए और बोले: “हे आचार्य! हम पर भारी उपसर्ग हो रहे हैं, हमें रक्षा का कोई उपाय बताइए।” - भद्रबाहु स्वामी करुणा से पिघल गए, और उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ की शरण लेकर एक विशेष स्तोत्र रचा – “Uvassagaharam Stotra” – यानी ऐसा स्तोत्र जो उपसर्गों का हर (नाश) करे।
- स्तोत्र का प्रभाव
- जब यह स्तोत्र श्रद्धा और एकाग्रता से पढ़ा गया, तो - व्यंतर देव की उग्रता शांत हुई, - उपसर्ग, रोग और बाधाएँ कम होने लगीं, - और जैन समाज को शांति और सुरक्षा का अनुभव हुआ। - मान्यता है कि इस स्तोत्र से देवों की भी उपस्थिति होती है, जो साधक की रक्षा करते हैं, परन्तु जैन दृष्टि से मुख्य कारण भक्त की श्रद्धा और अपने कर्मों का क्षय है।
- एक गाथा हटाने की परंपरा
- पुरानी कथाओं में आता है कि मूल स्तोत्र अधिक गाथाओं वाला था और अत्यन्त शक्तिशाली माना जाता था। - जब लोगों ने इसे छोटी–छोटी सांसारिक इच्छाओं के लिए अत्यधिक उपयोग करना शुरू किया, तो दुरुपयोग के डर से बाद में एक–दो गाथाएँ प्रचलन से हटा दी गईं, और आज सामान्य रूप से कम गाथाओं वाला रूप ही पढ़ा जाता है। - अलग–अलग परंपराओं (श्वेताम्बर, दिगंबर, क्षेत्रीय परंपराएँ) में गाथाओं की संख्या में थोड़ा फर्क मिल सकता है, पर भाव एक ही है – भगवान पार्श्वनाथ की शरण लेकर उपसर्गों का नाश और आध्यात्मिक कल्याण।
इस कथा और स्तोत्र की सरल प्रस्तुति आप यहाँ भी देख सकते हैं: Uvasaggaharam Stotra – Jain Stories
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3. परंपरा (श्वेताम्बर – दिगंबर)
- श्वेताम्बर मूरतिपूजक परंपरा
- दिगंबर परंपरा
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संक्षेप में: Uvassagaharam Stotra भगवान पार्श्वनाथ की ऐसी भक्ति–प्रार्थना है जो
- बाहरी उपसर्ग (रोग, विपत्ति, ग्रह–बाधा आदि)
- और आंतरिक उपसर्ग (क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषाय)