Keval gyani क्या नहीं देखते जो हम देखते
Kevaljñānī जो नहीं देखते, वही हम मुख्य रूप से देखते हैं – मिथ्या, विकृत, और कर्म से ढका हुआ दृष्टि‑दृश्य। सरल भाषा में:
- राग‑द्वेष से देखी हुई दुनिया
- हम किसी को “अपना–पराया, दोस्त–दुश्मन, अच्छा–बुरा” मानकर देखते हैं। - केवली में राग‑द्वेष शून्य होता है, इसलिए वह किसी को भी आसक्ति या घृणा की नज़र से नहीं देखते।
- मिथ्या स्वार्थ और अहंकार
- हम “मैं, मेरा, यह मैं कर रहा हूँ” ऐसे अहंकार से चीज़ें देखते और समझते हैं। - केवली में अहंकार नहीं होता, इसलिए वे अहंकार से पैदा होने वाली कल्पनाएँ, बढ़ा‑चढ़ा कर देखना या हीन‑भावना से देखना – ये सब नहीं देखते।
- भ्रम, अज्ञान और अंदाज़ा
- हमारी दृष्टि पाँच इन्द्रियों, मन और सीमित ज्ञान पर निर्भर है, इसलिए बहुत‑सी बातें हम अधूरी जानकारी से “मान लेते” हैं – यह सब भ्रम है। - केवली को सभी द्रव्य और उनके सभी पिछले‑वर्तमान‑भविष्य के पर्याय प्रत्यक्ष, स्पष्ट जानते हैं, इसलिए उन्हें “ग़लत फ़ैमी, अनुमान, शक” जैसा कुछ नहीं दिखता।
- कर्म से ढकी हुई रूप‑रंग की दुनिया
- हम किसी का शरीर, रूप, पद, पैसे, जाति, परिवार देखकर निर्णय बनाते हैं – यह सब नामा‑गोत्र आदि कर्म के फल हैं। - केवली आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप और यथार्थ अवस्था में देखते हैं, केवल बाहरी आवरण से मोहित नहीं होते।
- अस्थायी को स्थायी मानकर देखना
- हम सुख, पद, सम्बन्ध, शरीर आदि को “जैसे हमेशा रहेंगे” ऐसा मानकर देखते हैं। - केवली हर वस्तु की क्षणिकता और नश्वरता को प्रत्यक्ष जानते हैं, इसलिए वे इस स्थायित्व के भ्रम को नहीं देखते।
संक्षेप में: हम जो देखते हैं, उसमें मिथ्यात्व, राग‑द्वेष, अहंकार, अनुमान और कर्म‑जन्य भ्रम मिला हुआ होता है। केवलज्ञानी भी वही जगत देखते हैं, परन्तु बिल्कुल शुद्ध, निष्पक्ष, सम्पूर्ण और बिना किसी कर्मीय परदे के। इसलिए “जो हम गलत ढंग से देखते हैं, वह केवली वैसे गलत ढंग से नहीं देखते।”