Meru teras kya hein
“मेरु तेऱस” या “मेरु त्रयोदशी” जैन धर्म का एक विशेष व्रत‑पर्व है।
बहुत सरल भाषा में:
- कब होता है?
- यह हर साल पक्ष की 13वीं तिथि (त्रयोदशी) को मनाया जाता है। - किस महीने / शुक्ल या कृष्ण पक्ष में पड़ेगा, यह अलग‑अलग परम्पराओं व पंचांग के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है, पर तिथि “तेरस (13)” ही रहती है, इसलिए इसे मेरु तेऱस कहा जाता है।
- किसके लिए मनाते हैं?
- यह दिन मुख्यतः आदिनाथ (ऋषभदेव) भगवान के निर्ग्रन्थ – निर्वाण कल्याणक की स्मृति में माना जाता है। - साथ ही, भक्त पिङ्गल कुमार नामक श्रावक की अत्यन्त कठोर तपस्या (मेरु व्रत) को भी स्मरण करते हैं।
- “मेरु” शब्द का अर्थ क्या है?
- मेरु जैन ब्रह्माण्ड‑विज्ञान में मेरु पर्वत (सुमेरु) का नाम है, जो ब्रह्माण्ड का केन्द्रीय, अत्यन्त पवित्र पर्वत माना जाता है। - मेरु की तरह आध्यात्मिक ऊँचाई, स्थिरता और शुद्धता प्राप्त करने की भावना से यह व्रत किया जाता है।
- मेरु तेऱस पर क्या करते हैं? (मुख्य भाव)
परम्परा और क्षमता के अनुसार भिन्न हो सकता है, पर सामान्य रूप से – - उपवास / केवल जल या निर्जल व्रत (कोविहार) रखा जाता है। - भगवान आदिनाथ की प्रतिमा के सामने चाँदी / धातु के “मेरु” रखकर, स्वस्तिक बनाकर, विशेष पूजन और भक्तिभाव से यंत्र‑पूजा / मंत्र‑जाप किया जाता है। - दान, जप, स्वाध्याय, सामायिक, प्रभु‑भक्ति आदि से कर्मों की निर्जरा की भावना रखी जाती है। - कई परम्पराओं में यह व्रत लगातार 13 मास या 13 वर्ष तक, हर तेऱस को अपनी शक्ति के अनुसार किया जाता है – इसलिए इसे बहुत उच्च कोटि का तप माना गया है।
- फल और महत्व
- कहा गया है कि अहिंसा, संयम, त्याग और तप के साथ किया गया यह व्रत बंधन‑कर्मों को क्षीण करने में सहायक होता है। - इसके माध्यम से साधक मुक्ति‑मार्ग (मोक्ष‑मार्ग) की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा लेता है।
- दिगम्बर और श्वेताम्बर मत
- दोनों सम्प्रदायों में आदिनाथ भगवान के निर्वाण‑कल्याणक का महत्त्व, और मेरु तेऱस की तप‑प्रधान भावना स्वीकार है। - तिथि‑गणना, पूजा‑विधि, मन्त्र आदि में थोड़े व्यवहारिक अन्तर हो सकते हैं, पर मूल भाव – आदिनाथ भगवान की स्मृति, पिङ्गल कुमार की तपस्या का आदर्श, और अपनी आत्मा को शुद्ध करने का संकल्प – सबमें समान रहता है।
सार में, मेरु तेऱस = मेरु त्रयोदशी = आदिनाथ भगवान के निर्वाण‑स्मरण और कठोर तप का विशेष जैन व्रत‑पर्व है, जिसमें आत्मशुद्धि, संयम और मोक्ष‑मार्ग की ओर प्रगाढ़ संकल्प मुख्य होता है।