Ashtotari kya hai
“Ashtotari” (या “अष्टोत्तरी / अष्टोत्तर”) का साधारण अर्थ है – 108 से जुड़ी पूजा या स्तुति।
जैन धर्म में अष्टोत्तरी क्या है?
- शाब्दिक अर्थ
- अष्ट = 8 - उत्तरी = ऊपर → मतलब “सौ से आठ अधिक” = 108
- व्यवहार में प्रयोग
जैन परंपरा में “अष्टोत्तरी” सामान्यतः इन अर्थों में आता है: - अष्टोत्तरी पूजन / अष्टोत्तरी पूजा – किसी तीर्थंकर (जैसे महावीर प्रभु, पार्श्वनाथ प्रभु आदि) के 108 नाम या 108 गुणों का क्रम से स्मरण और पूजन। - अष्टोत्तर शतनामावली – भगवान के 108 नामों की सूची, जैसे – “श्री पार्श्वनाथ भगवान 108 नाम” इत्यादि। - माला के 108 दाने – 108 दानों की माला से नवकार मंत्र या अन्य जाप करना, जो पंच‑परमेष्ठी के 108 गुणों का स्मरण कराता है (अरिहंत 12, सिद्ध 8, आचार्य 36, उपाध्याय 25, साधु 27 = 108)। ( jainknowledge.com)
- किसकी अष्टोत्तरी?
प्रचलन में कई प्रकार की अष्टोत्तरी हैं, जैसे – - महावीर भगवान अष्टोत्तरी - पार्श्वनाथ भगवान अष्टोत्तरी - अन्य तीर्थंकरों या देव‑देवी के 108 नाम / गुण पर आधारित स्तुति या पूजन। ( jainknowledge.com)
- श्वेतांबर‑दिगंबर दृष्टि
- दोनों परंपराएँ 108 को अत्यन्त मंगल और पवित्र अंक मानती हैं – पंच‑परमेष्ठी के 108 गुण, 108 दानों की माला, 108 नामावली इत्यादि। - अष्टोत्तरी के पाठ, भाषा, और क्रम में परंपरा‑परंपरा और स्थानानुसार थोड़ा अंतर हो सकता है, पर मूल भावना एक ही है – भगवान के गुणों का 108 बार स्मरण और वंदन।
संक्षेप में: अष्टोत्तरी = किसी तीर्थंकर आदि के 108 नाम/गुणों का स्तवन या पूजन‑प्रकार, जो हमारे भीतर श्रद्धा, विनय और गुण‑स्मरण बढ़ाने के लिए किया जाता है।