Kalsurik kasai full story
“कालसुरिक कसाई” की कथा भगवान महावीर ने अहिंसा के सही अर्थ को समझाने के लिए सुनाई है। इसे बहुत सरल भाषा में समझें:
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कथा – कालसुरिक कसाई
मगध देश के राजा बिम्बिसार थे। एक बार वे भगवान महावीर के समवसरण में गए। वहाँ भगवान ने बताया कि राजा के कर्मों के कारण उन्हें आगे चलकर नरक गति मिलेगी।
राजा यह सुनकर बहुत घबरा गए और विनम्रता से बोले – “भगवन्! ऐसा कौन‑सा उपाय है जिससे नरक में जाने का यह बंधन टल जाए?”
भगवान महावीर का उत्तर
भगवान महावीर ने कहा (भावार्थ):
> “तुम्हारे नगर में जो कालसुरिक कसाई है, > वह यदि एक दिन के लिए भी भैंसों का वध न करे, > तो तुम्हारा नरक‑बंधन टल सकता है।”
राजा को यह उपाय तो “आसान” लगा। उन्होंने सोचा – “बस, एक दिन के लिए कसाई से कह देंगे कि भैंसें मत काटो, काम बन जाएगा।”
राजा का आदेश
राजा ने तुरंत दूत भेजकर कालसुरिक कसाई को बुलाया और कहा:
“आज के दिन तुम एक भी भैंस मत काटना। जो रोज काटते हो, आज मत काटो। यह मेरे लिए बहुत जरूरी है।”
राजा ने उसे बहुत डराया‑समझाया, पुरस्कार और दंड – दोनों की बात कही, तो कालसुरिक ने बाहर से तो हामी भर दी:
“ठीक है महाराज, आज मैं एक भी भैंस नहीं काटूँगा।”
बाहर से अहिंसा, भीतर से हिंसा
अब असली बात आती है, जो भगवान महावीर ने समझाई:
- उस दिन कालसुरिक ने व्यवहार से सचमुच एक भी भैंस नहीं काटी।
- लेकिन उसके मन में सोच चलती रही –
अर्थात:
- शरीर से उसने हिंसा नहीं की,
- पर चित्त (भाव) से वह पूरे दिन वध करता ही रहा।
भगवान महावीर की स्पष्टता
भगवान महावीर ने यही बात समझाते हुए कहा:
- “यदि मन में हिंसा भरी हुई है,
- और यदि मन से अहिंसक हो,
इसलिए:
- कालसुरिक ने “एक दिन जानवर न काटने” का काम तो कर लिया,
यहीं भगवान महावीर ने राजा बिम्बिसार को समझाया कि:
- केवल बाहरी रोक‑टोक (आज मत काटो, आज मत मारो)
- जब तक अंदर की हिंसक भावना (मन‑वाणी‑चित्त) नहीं बदले,
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इस कथा से जैन दृष्टि से क्या सीख मिलती है?
- अहिंसा = केवल न मारना नहीं
– अहिंसा का मतलब है - मन में क्रूरता न रखना, - किसी के दुख में आनंद न लेना, - “काश इसे ऐसा कर दूँ, मार दूँ, सता दूँ” जैसी भावना भी न रखना।
- कर्म का मूल – भावना (भावकर्म)
– जैन धर्म में पाप‑पुण्य, अगले जन्म, नरक‑देव गति का मुख्य कारण बाहरी घटना से अधिक अंदर के भाव माने गए हैं।
- राजा और कसाई – दोनों के लिए संदेश
- राजा के लिए: केवल बाहर से किसी को एक दिन रोक देने से उसका नरक‑बंधन गहराई से नहीं कटता, उसे अपना स्वभाव, लोभ, राग‑द्वेष भी बदलने होंगे। - कसाई के लिए: अहिंसा तब शुरू होती है जब रोज़गार के नाम पर भी हिंसा छोड़ने की अंदर से सच्ची इच्छा जगे।
- आज के जीवन में प्रयोग
- कोई कहे “हम तो किसी को मारते नहीं, बस देख लेते हैं, खाते हैं, मन में क्या आता है इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?” - इस कथा से समझ आता है कि मन की सहमति, मन की हिंसा भी हिंसा ही है।
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यह कथा जैन परंपरा में भगवान महावीर की अहिंसा‑दृष्टि को समझाने के लिए सुनाई जाती है। विभिन्न लेखक और प्रवचनकार नाम की वर्तनी थोड़ा अलग बोल सकते हैं – कालसौरिक, कालसुरिक आदि – लेकिन मूल संदेश एक ही रहता है:
> “सच्ची अहिंसा मन, वचन और काया – तीनों में चाहिए। > केवल बाहर से न मारना काफी नहीं, > भीतर से मारने की इच्छा भी छोड़नी पड़ती है।”