यक्ष देवता रक्षक देवता
जैन धर्म में “यक्ष देवता” और “रक्षक देवता” आपस में जुड़े हुए विषय हैं, लेकिन दोनों शब्दों का प्रयोग थोड़ा अलग तरह से होता है।
1. यक्ष देवता (शासन देव / शासक यक्ष)
- हर 24 तीर्थंकर के साथ एक पुरुष देव (यक्ष) और एक स्त्री देवी (यक्षिणी) जुड़ी रहती हैं।
- इन्हें शासन देव–देवी या शासन यक्ष–यक्षिणी कहा जाता है।
- इनका काम तीर्थंकर के शासन (धर्म-कार्य) की व्यवस्था सम्भालना, जिनालय, तीर्थ, जिनाग्न्याओं की रक्षा करना, और भक्तों के कल्याण में सहायक होना है।
- उदाहरण के लिए:
यक्ष देवता स्वयं मोक्षस्थ सिद्ध नहीं होते, वे अभी देव-गति के संसारी जीव हैं, लेकिन धर्म-रक्षा में नियोजित हैं।
यक्ष–यक्षिणी की विस्तृत सूची आप यहाँ देख सकते हैं
2. रक्षक देवता
“रक्षक देवता” सामान्य शब्द है – इसका अर्थ है जो रक्षा करने वाला देव हो। जैन परंपरा में कई प्रकार से यह शब्द प्रयोग होता है:
- तीर्थंकर / जिनालय के रक्षक देव
- जैसे धरणेन्द्र–पद्मावती, चक्रेश्वरी आदि – ये भी रक्षक ही हैं, पर इनको विशेष रूप से शासन देव–देवी कहा जाता है।
- तीर्थों / पर्वतों / प्रदेशों के रक्षक देव
- अनेक पुराणों और लोक वर्णनों में आता है कि अमुक पर्वत, अमुक कुंड, अमुक द्वार आदि का एक “रक्षक देव” नियोजित है, जिसका काम उस स्थान की रक्षा करना है।
- लोकप्रसिद्ध रक्षक वीर / देव
- जैसे मणिभद्र वीर, घंटाकर्ण वीर, भैरव आदि – जिन्हें कई जैन “रक्षक देव” के रूप में मानते हैं कि यह विपत्ति, बाधा, भूत-प्रेत आदि से रक्षा करते हैं। - इनका स्थान अरिहंत–सिद्ध–पंच परमेष्ठी से नीचे है; ये भी देव-गति के संसारी जीव हैं, जिनका उपयोग केवल उपासना / रक्षा की भावना से होता है, इन्हें कभी भी तीर्थंकर के समान नहीं माना जाता।
3. दोनों में सम्बन्ध और भेद
- संबंध
- भेद
4. जैन दृष्टि से सावधानी
- मुख्य आराध्य केवल – अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु (पंच परमेष्ठी) हैं।
- यक्ष, यक्षिणी, रक्षक देव आदि – सहायक देव हैं, इनसे लौकिक बाधा-निवारण की भावना रखी जाती है, पर इन्हें कभी भी परम शरण नहीं माना जाता।
- जप, तप, स्वाध्याय, संयम – यही असली रक्षा करते हैं; देवता तो केवल निमित्त (सहायक) हैं।
संक्षेप में: हर यक्ष देवता को रक्षक माना जा सकता है, लेकिन हर रक्षक देवता आवश्यक नहीं कि किसी तीर्थंकर के शासन यक्ष ही हों।