जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ जीवन चरित्र
श्री पार्श्वनाथ जी जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर हैं। उनका जीवन और उपदेश जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यहाँ उनका संक्षिप्त जीवन चरित्र प्रस्तुत है:
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि: भगवान पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी (काशी) में अश्वसेन राजा और रानी वामा देवी के यहाँ हुआ था। इनका जन्म लगभग 877 ईसा पूर्व माना जाता है। इनका जन्मोत्सव पौष शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है।
बाल्यकाल और युवावस्था: पार्श्वनाथ जी बचपन से ही अत्यन्त करुणामयी, संयमी और बुद्धिमान थे। वे सभी जीवों के प्रति दया रखते थे। युवावस्था में उनका विवाह प्रभावती देवी से हुआ था, लेकिन सांसारिक सुखों में वे आसक्त नहीं रहे।
संन्यास और तपस्या: तीस वर्ष की आयु में उन्होंने राजपाट, परिवार और सांसारिक सुखों का त्याग कर दीक्षा ग्रहण की। बारह वर्ष तक कठोर तपस्या, ध्यान और साधना की। इस दौरान उन्होंने अनेक कठिनाइयाँ झेली, लेकिन कभी भी अहिंसा और सत्य के मार्ग से विचलित नहीं हुए।
केवलज्ञान (कैवल्य): बारह वर्ष की तपस्या के उपरांत उन्हें सम्मेद शिखर (पारसनाथ पर्वत, झारखण्ड) पर केवलज्ञान प्राप्त हुआ। वे 'अरिहंत' कहलाए और धर्म का उपदेश देने लगे।
चार महान व्रत (चतुर्विध व्रत): पार्श्वनाथ जी ने चार मुख्य व्रतों का उपदेश दिया —
- अहिंसा (अहिंसा परमो धर्म)
- सत्य
- अस्तेय (चोरी न करना)
- अपरिग्रह (संपत्ति का त्याग)
(पाँचवाँ व्रत, ब्रह्मचर्य, महावीर स्वामी ने बाद में जोड़ा।)
उपदेश और संघ: पार्श्वनाथ जी ने समाज में अहिंसा, सत्य, करुणा और अपरिग्रह के विचारों का प्रचार किया। उनके अनेक अनुयायी बने और उन्होंने संघ की स्थापना की।
निर्वाण (मुक्ति): सम्भवतः 100 वर्ष की आयु में पार्श्वनाथ जी ने सम्मेद शिखर (पारसनाथ पर्वत) पर निर्वाण प्राप्त किया। यह स्थान जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक है।
महत्व: भगवान पार्श्वनाथ के उपदेश और जीवन आज भी जैन धर्म के अनुयायियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित चार व्रत आज भी श्वेतांबर और दिगंबर दोनों संप्रदायों में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
प्रमुख प्रतीक: उनका चिन्ह (लांछन) सर्प (नाग) है। पार्श्वनाथ जी की मूर्तियों के पीछे या ऊपर सर्प की छाया दिखाई देती है।
निष्कर्ष: भगवान पार्श्वनाथ जी का जीवन त्याग, तपस्या, अहिंसा और सत्य का अप्रतिम उदाहरण है। उनका जीवन चरित्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों की नींव है।