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  • आत्मा के प्रकार - बहिरात्मा, अंतरात्मा, परमात्मा
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    आत्मा के प्रकार - बहिरात्मा, अंतरात्मा, परमात्मा

    7 months ago 186

    जैन दर्शन में “बहिरात्मा – अंतरात्मा – परमात्मा” से आत्मा के तीन अवस्थाओं को समझाया जाता है। यह कोई अलग‑अलग आत्माएँ नहीं हैं, एक ही आत्मा की तीन स्थिति हैं, जो उसके भाव और दृष्टि के अनुसार बदलती हैं।

    ---

    1. बहिरात्मा (बाहर की ओर लगी हुई आत्मा)

    अर्थ

    • “बहिर” = बाहर, इन्द्रियों की ओर
    • जो आत्मा शरीर, इन्द्रियों, धन, परिवार, मान‑अपमान आदि को ही सब कुछ मानकर उनमें ही लिप्त रहे, उसे “बहिरात्मा” की अवस्था कहते हैं।
    • उसे अपने असली स्वरूप (ज्ञानी–द्रष्टा आत्मा) का बोध नहीं होता।

    लक्षण (कैसे पहचानें)

    • सुख–दुःख का कारण सिर्फ़ बाहरी चीजों को मानना।
    • “मेरा शरीर, मेरा घर, मेरा व्यवसाय, मेरी जीत, मेरी हार” में ही उलझन।
    • क्रोध, मान, माया, लोभ, राग‑द्वेष में डूबा रहना।
    • धर्म भी सिर्फ़ नाम, दिखावा, परम्परा के लिए करना – असली अंतरंग शुद्धि की तरफ़ ध्यान न होना।

    ---

    2. अंतरात्मा (अंदर की ओर मुड़ती आत्मा)

    अर्थ

    • “अंतर” = भीतर
    • जब वही जीव बाहर की जगह भीतर की ओर मुड़ता है, अपने दोषों को देखना शुरू करता है, और आत्मा को पहचानने का प्रयत्न करता है, तो वह “अंतरात्मा” की अवस्था में आता है।

    मुख्य बातें

    • सम्यग्दर्शन (सही दृष्टि) की ओर बढ़ना –
    “मैं केवल शरीर या पदार्थ नहीं, चैतन्य आत्मा हूँ” यह भाव जागने लगना।
    • पाप से घृणा, पुण्य से लगाव नहीं, बल्कि दोनों से ऊपर उठने की भावना।
    • पश्चाताप, प्रायश्चित्त, अपने दोषों को स्वीकारना और उन्हें हटाने का प्रयत्न।
    • जाप, ध्यान, स्वाध्याय, संयम – इनसे अंतर में शांति का अनुभव होना शुरू हो जाता है।

    यह अवस्था मोक्ष का मार्ग खोलती है। अधिकतर साधक जीवनभर बहिरात्मा से अंतरात्मा की ओर यात्रा ही कर रहे होते हैं।

    ---

    3. परमात्मा (पूर्ण शुद्ध आत्मा)

    अर्थ

    • “परम” = सर्वोच्च, पूर्ण।
    • जब आत्मा से सभी कर्मों के घोर बंधन समाप्त हो जाते हैं, मोह आदि कषाय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, तब वही जीव सिद्ध अवस्था में पहुँचकर “परमात्मा” कहलाता है।

    जैन दृष्टि से

    • परमात्मा = सिद्ध भगवान – जिनमें
    - न जन्म‑मृत्यु - न सुख‑दुःख का स्पर्श - न राग‑द्वेष
    • केवल अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख, अनन्त वीर्य का स्वरूप।
    • वहीं आत्मा की सबसे शुद्ध, सर्वोच्च अवस्था है – मोक्ष।

    ---

    तीनों का आपसी सम्बन्ध (एक ही आत्मा की यात्रा)

    1. बहिरात्मा – अज्ञान में डूबी, बाहर भागती आत्मा
    2. अंतरात्मा – जागती हुई, भीतर लौटती, स्वयं को पहचानती आत्मा
    3. परमात्मा – पूरी तरह जागी हुई, कर्मरहित, मुक्त आत्मा

    यानी: बहिरात्मा → (सम्यक्त्व, साधना, संयम) → अंतरात्मा → (पूर्ण क्षयोपशम, मोक्ष) → परमात्मा

    ---

    दिगंबर–श्वेतांबर दृष्टि

    • “बहिरात्मा, अंतरात्मा, परमात्मा” जैसी भाषा मुख्यतः उपदेश, स्वाध्याय, भक्ति‑ग्रन्थों और प्रवचनों में आती है,
    न कि आगमों में किसी “टेक्निकल वर्गीकरण” के रूप में।
    • परन्तु आत्मा की इन तीन अवस्थाओं का भावार्थ –
    (अविवेकी संसार‑भाव → विवेकी साधक‑भाव → सिद्ध‑भाव) दोनों परम्पराएँ (दिगंबर और श्वेतांबर) स्वीकार करती हैं।

    ---

    हमारे लिए इसका साधारण अभ्यास

    बहिरात्मा से अंतरात्मा और आगे परमात्मा की ओर बढ़ने के लिए:

    1. स्वरूप‑स्मरण

    - दिन में कई बार मन में दोहराना: “मैं शुद्ध आत्मा हूँ, शरीर नहीं।”

    1. दोष‑निरीक्षण

    - शाम को थोड़ी देर बैठकर दिन भर के क्रोध, झूठ, कठोर वाणी, आसक्ति को देखना और उनसे अलग होना।

    1. स्वाध्याय और जप

    - नवकार मंत्र, आत्मस्तुति, आदि का जप करते समय “मुझमें भी वही आत्मा है जो अरिहन्त‑सिद्ध में है” ऐसा भाव रखना।

    1. अहिंसा और संयम

    - वाणी, विचार और व्यवहार में हिंसा, कटुता कम करना – यह बहिरात्मा से अंतरात्मा की ओर बड़ा कदम है।

    इसी प्रकार थोड़ी‑थोड़ी प्रगति से वही जीव, जो आज बहिरात्मा की दशा में है, एक दिन परमात्मा की पूर्ण शुद्ध अवस्था तक पहुँच सकता है।

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