pesatiya chand japo jai jinendra varte anant
ये पंक्ति किसी प्रचलित जैन स्तवन / भजन की लगती है, न कि किसी मूल आगमिक सूत्र की। शब्द थोड़े बिगड़े हुए भी हो सकते हैं, लेकिन भाव सरल है:
“pesatiya chand japo, Jai Jinendra varte anant” (लगभग अर्थ)
- “pesatiya chand japo” –
- “Jai Jinendra varte anant” –
सीधा‑सा भाव यह है: “जैसे हम चाँद को बार‑बार देखकर आनंद लेते हैं, वैसे ही अंतःकरण से ‘जय जिनेन्द्र’ नाम का जप करते रहें; जिनेन्द्र भगवान की अनन्त महिमा और उनके अनन्त गुणों का स्मरण करते रहें – यही सच्ची भक्ति और पुण्य का कारण है।”
यह पंक्ति भक्ति‑गीत के स्वरूप में है, इसलिए
- यह न तो किसी विशिष्ट “श्वेतांबर–दिगंबर” आगमिक सूत्र का भाग है,
- न ही किसी प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र (जैसे भक्तामर, कल्याणमंदिर आदि) की पंक्ति है;