Ekasna navkarsi pachkan
“Ekasna navkarsi pachkan” मतलब आमतौर पर दो तरह के पच्चक्खाण 1) नवकारसी (Navkarsi) का पच्चक्खाण 2) एकासना (Ekasanu / Ekashana) का पच्चक्खाण
नीचे मैं दोनों का सरल रूप (Śvetāmbara परम्परा में प्रचलित) और उनका अर्थ दे रहा हूँ।
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1. नवकारसी (Navkarsi) पच्चक्खाण – मूल पाठ (Prakrit)
Navkarsi Pachkhan:
> Uggae sure, namukkāra-sahiam, porisim, sāddha-porisim, > sure uggae purimaddha, avaddha, mutthi-sahiam, pachchakkhāi (pachchakkhāmi), > chauviham pi āhāram, asanam, pānam, khāimam, sāimam, > annatthana-bhogenaṃ, sahasāgārenaṃ, pachchhannakāleṇaṃ, disāmoheṇaṃ, > sāhuvayaṇeṇaṃ, mahattara-gāreṇaṃ, savva-samāhi-vattiya-gāreṇaṃ, > vosirai (vosirāmi).
(उच्चारण आसान रूप में लिखा है, शुद्ध प्राकृत अक्षर थोड़े भिन्न हो सकते हैं, पर भाव यही है।)
नवकारसी पच्चक्खाण – सरल अर्थ
संक्षेप में आप यह संकल्प लेते हैं:
- आज मैं
- फिर एक जगह बैठकर, मुट्ठी बाँधकर (मुट्ठि साहियं),
- बीच में
भाव: “मैं नवकारसी का नियम लेता हूँ, भगवान की शरण में, सावधानी से, और जो भूल हो जाए उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”
नवकारसी के नियम व विस्तार और भी सरल भाषा में आप यहाँ पढ़ सकते हैं: (यहीं पर Navkarsi व सुबह के पच्चक्खाण की अच्छी जानकारी दी है)
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2. एकासना (Ekasanu / Ekashana) पच्चक्खाण
एकासना का पच्चक्खाण अक्सर आयम्बिल / निवि / एकासनु / बियासनु – संयुक्त पच्चक्खाण के रूप में बोला जाता है। उसका प्रचलित प्राकृत रूप संक्षेप में:
> Uggae sure, namukkaar-sahiam, porisim, sāddha-porisim, > mutthi-sahiam, pachchakkhāi (pachchakkhāmi), uggae, sure, > chauviham pi āhāram, asanam, pānam, khāimam, sāimam, > annatthana-bhogenaṃ, sahasāgārenaṃ, pachchhannakāleṇaṃ, disāmoheṇaṃ, > sāhuvayaṇeṇaṃ, mahattara-gāreṇaṃ, savva-samāhi-vattiya-gāreṇaṃ, > aayambilam, nivvigaiam, vigaio pachchakkhāi (pachchakkhāmi) … > … ekaasanam, biyaasanam, pachchakkhāi (pachchakkhāmi) … > … vosirai (vosirāmi).
(यह पूरा सूत्र काफी लम्बा है; यहाँ मुख्य भाग का सार दे रहा हूँ जिसमें Ekasana का संकल्प आता है।)
एकासना पच्चक्खाण – सरल अर्थ
भावनात्मक रूप से आप यह कहते हैं:
- आज मैं
- भोजन के अलावा
- साथ ही यह भी भाव है:
- अंत में “वोसिरामि” कहकर
एकासना कैसे करना है, उसका सरल स्टेप‑बाय‑स्टेप मार्गदर्शन आप यहाँ देख सकते हैं:
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परम्परा का अंतर – संक्षेप में
- श्वेताम्बर:
- दिगम्बर:
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साधारण व्यवहार के लिए
यदि पूर्ण प्राकृत पाठ याद न हो तो भी, कम से कम इतने भाव से पच्चक्खाण ले सकते हैं:
नवकारसी के लिए > “आज मैं अरिहंत, सिद्ध आदि पंच परमेष्ठी की शरण लेकर > नवकारसी का नियम लेता/लेती हूँ – > सूर्योदय के 48 मिनट बाद तक कुछ नहीं खाऊँगा‑पीऊँगा, > फिर एक जगह बैठकर 3 बार नवकार मंत्र बोलकर ही > भोजन या पानी लूँगा/लूँगी। > जो भी भूल हो, उसके लिए क्षमा चाहता/चाहती हूँ।”
एकासना के लिए > “आज मैं पंच परमेष्ठी की शरण लेकर > एकासना का नियम लेता/लेती हूँ – > दिन में केवल एक बार, एक ही बैठक में, > सूर्यास्त से पहले, सावधानी और संयम से भोजन करूँगा/करूँगी, > और बाकी समय कुछ नहीं खाऊँगा‑पीऊँगी। > जो भी त्रुटि हो, उसके लिए क्षमा चाहता/चाहती हूँ।”
यह सरल भाव भी परम्परा के अनुरूप है और गृहस्थ के लिए पर्याप्त है।