Are keval gyani's arihant?
हर keval jnani (केवल ज्ञान प्राप्त आत्मा) अनिवार्य रूप से Arihant नहीं होता – यह इस बात पर निर्भर है कि वह केवलज्ञान किस प्रकार के जीव ने पाया है।
सरल भेद समझिए:
- Arihant कौन है?
- वह जीव जिसने - चारों घाती कर्म (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय) पूरी तरह नष्ट कर दिए हों, - केवल ज्ञान और केवल दर्शन प्रकट हो चुका हो, - और अभी देहधारी हो, संसार में जीवित हो। - ऐसा केवलज्ञानी जीव Arihant या Kevali कहलाता है। - तीर्थंकर-केवलि (जिनके द्वारा संघ की स्थापना होती है) भी Arihant ही हैं, पर विशेष रूप से Tirthankar Arihant कहलाते हैं।
- सिद्ध (Siddha) में भी केवल ज्ञान है, पर Arihant नहीं
- जब वही आत्मा शरीऱ छोड़कर सिद्धशिला पहुँच जाती है, तो - उसका केवल ज्ञान, केवल दर्शन तो बना रहता है, - पर अब कोई शरीर नहीं, कोई प्रवचन नहीं, संघ-व्यवस्था नहीं। - इस अवस्था को हम Siddha कहते हैं, Arihant नहीं। - इसलिए: हर सिद्ध भी केवलज्ञानी है, पर सिद्ध को Arihant नहीं कहते।
- तो उत्तर क्या हुआ?
- देहधारी केवलज्ञानी → Arihant - शरीर छोड़कर मुक्त केवलज्ञानी → Siddha, Arihant नहीं - यानी: - “हर Arihant keval jnani होता है” – हाँ, सही। - “हर keval jnani Arihant है” – नहीं, क्योंकि सिद्ध भी केवलज्ञानी है पर Arihant नहीं कहलाता।
- Digambar–Shwetambar दोनों में
- दोनों परम्पराएँ मानती हैं कि: - Arihant = देहधारी केवलज्ञानी, चार घाती कर्म नष्ट - Siddha = देह रहित, पूर्ण मुक्त केवलज्ञानी - शब्द-प्रयोग में थोड़ा अंतर हो सकता है, पर यह मूल बात दोनों में समान है।
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