Gyan Bhavna purv kya karniya hai
ज्ञान भावना किसी भी “आत्म‑विकास” वाली भावना की तरह सीधी ध्यान‑साधना है। इसे सही फल देने के लिए पहले थोड़ी तैयारी ज़रूर मानी गयी है।
ज्ञान भावना से पहले क्या करना चाहिए?
- शरीर‑स्थान की शुद्धि
- नहाकर या कम‑से‑कम हाथ‑मुंह धोकर बैठें। - शांत, साफ, अहिंसक (जहाँ कम विघ्न हों) जगह चुनें।
- मन की शुद्धि (क्षमा‑भाव)
- भीतर से भाव लें – “आज जो भी राग‑द्वेष हुए, मैं सबके लिए क्षमा चाहता हूँ।” - किसी विशेष व्यक्ति से द्वेष हो तो मन में ही क्षमायाचना करें।
- नवकार मंत्र / ॐ नमः सिद्धेभ्यः
- 3–9 बार नवकार मंत्र या कम से कम एक बार श्रद्धापूर्वक जप करें। - भावना रखें – “मैं सिद्धों‑आरिहंतों के ज्ञान की शरण में बैठ रहा हूँ।”
- सामायिक‑भाव / स्थिर आसन
- अगर संभव हो तो पहले सामायिक कर लें, नहीं तो कम से कम - सीधा आसन - आँखें हल्की बंद - देह को अधिक न हिलाने का निश्चय - मन में संकल्प – “थोड़ी देर केवल आत्म‑ज्ञान के विचार में ही रहूँगा।”
- स्वीकृति (निश्चय या नीयत)
दो‑तीन वाक्य मन में या धीमे बोलकर: - “मेरा असली स्वरूप चेतनज्ञानी आत्मा है।” - “मैं शरीर, नाम, रिश्ते नहीं; मैं जानने‑देखने वाला आत्मा हूँ।”
- फिर ज्ञान‑भावना का चिंतन
अब मुख्य भावना शुरू करें, जैसे – - जैन दर्शन में बताए पाँच ज्ञान (मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, केवलज्ञान) पर विचार। - यह सोचना – - “मेरे भीतर ज्ञान की अनंत शक्ति है, कर्मों के कारण वह आज सीमित दिखती है।” - “सही स्वाध्याय, तप और संयम से यही जीव केवल‑ज्ञान की अवस्था भी प्राप्त कर सकता है।”
संक्षेप में: ज्ञान‑भावना के पहले 1) शरीर‑स्थान शुद्ध, 2) मन को क्षमा‑भाव से हल्का, 3) नवकार से शरण, 4) स्थिर आसन/सामायिक‑भाव, 5) “मैं आत्मा हूँ” का निश्चय – फिर शांत मन से ज्ञान के स्वरूप, उसकी महिमा और अपनी अंतरंग ज्ञान‑शक्ति पर चिंतन करना चाहिए।
इसी तरह की सरल तैयारी से भावना गहरी और प्रभावी बनती है व कर्म क्षय में सहायक होती है।