Narak gati ke bare mai samjaiye
नरक गति (नारक गति) को बहुत सरल शब्दों में समझिए:
1. नरक गति क्या है?
जब जीव मरने के बाद नरक में जन्म लेता है, उसे नरक गति कहते हैं। चार गातियाँ होती हैं: 1) देव गति – देवों के रूप में 2) मनुष्य गति – इंसान के रूप में 3) तिर्यंच गति – पशु, पक्षी, कीट, वनस्पति आदि 4) नरक गति – नर्क में, बेहद दुखों वाला जन्म2. नरक में कैसा जीवन होता है?
जैन धर्म में नरक को केवल दुःख और कष्ट का स्थान बताया गया है:- वहाँ क्षण भर भी शान्ति नहीं होती
- नरकी जीव एक–दूसरे को काटते, मारते, सताते रहते हैं
- शरीर निरन्तर ताप, पीड़ा, जलन, चोट, भय, चीत्कार सहता है
- वहाँ न सच्चा मित्र, न परिवार, न धर्म–साधना का अवसर
- नरक का शरीर भी विशेष प्रकार का होता है (वैक्रिय शरीर), जो कई प्रकार के कष्ट झेलता है
नरक गति कभी भी सुख का स्थान नहीं है; केवल कर्मों का भयानक दुःखद फल है।
3. नरक गति क्यों मिलती है? (मुख्य कारण)
जैन सिद्धांत के अनुसार, कर्मों के कारण जन्म मिलता है। नरक गति विशेषतः इन पापों से बनती है:- बहुत हिंसा – जान-बूझकर जीवों को कष्ट देना, मारना, अंग-भंग करना
- क्रोध, द्वेष, बैर – किसी के प्रति गहरी नफरत, बदले की भावना
- छल, कपट, धोखा, चोरी, विश्वासघात
- कटु वाणी, गाली–गलौज, अत्याचार
- धर्म–आत्मा–साधु–श्रुत के प्रति असम्मान, निन्दा
- अत्यधिक आसक्ति (लालच, लोभ) और उन से प्रेरित पाप कर्म
इनसे भारी पाप कर्म (विशेषकर आयु, नाम, वेदनीय, मोहनीय कर्म) बंधते हैं, जो आगे चलकर नरक की आयु और नरकी शरीर का कारण बनते हैं।
4. नरक कितने प्रकार का है?
जैन लोक–विज्ञान के अनुसार सात (कुछ ग्रन्थों में सात) अधोलोक या नरक के स्तर बताए जाते हैं। ऊपर वाली नरक की तुलना में नीचे वाली नरक में- अंधकार ज़्यादा
- ताप व पीड़ा ज़्यादा
- आयु भी अक्सर ज़्यादा और कष्ट बहुत भयंकर
हर नीचे जाती नरक, ज़्यादा दुःखद मानी जाती है।
5. नरक में आयु (समय)
- नरक में जन्म लेने के बाद, जीव को निश्चित आयु पूरी होने तक वहाँ रहना पड़ता है
- इस बीच वह मर नहीं सकता, न आत्महत्या कर सकता है, न वहाँ से भाग सकता है
- नरक की एक–एक आयु बहुत लम्बी होती है (असंख्य वर्षों के बराबर), इसलिए कष्ट भी लंबे समय तक सहने पड़ते हैं
6. नरक से बाहर आने के बाद क्या होता है?
नरक की आयु ख़त्म होने पर जीव:- सीधा फिर नरक में नहीं जाता
- सीधा देव गति में भी नहीं जाता
- सामान्यतः मनुष्य या तिर्यंच गति (पशु आदि) में जाता है
7. नरक गति से कैसे बचें?
जैन धर्म का स्पष्ट संदेश है कि हमेशा नरक गति से बचने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए:- अहिंसा का पालन
- किसी भी जीव को जानबूझकर कष्ट न देना - भोजन, व्यवसाय, मनोरंजन – सबमें हिंसा को जितना हो सके कम करना
- क्रोध, मान, माया, लोभ पर काबू
- क्रोध कम करना, माफ़ करना सीखना - घमंड नहीं, सरलता और विनम्रता - छल–कपट नहीं, सीधा–सच्चा व्यवहार - अत्यधिक लालच से दूर रहना
- सदाचार
- सत्य बोलना - चोरी न करना - ब्रह्मचर्य/सय्यम का अभ्यास (अपनी स्थिति अनुसार) - मर्यादा और संयम से रहना
- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र की दिशा में प्रगति
- जैन तत्त्वज्ञान सुनना–समझना - सच्चे गुरुओं, साधु–साध्वियों का आदर - स्वाध्याय (धर्म का अध्ययन) और ध्यान
- पछतावा और प्रायश्चित
- जो भी पाप हो जाएँ, उन्हें हल्का समझकर न छोड़ें - ईमानदारी से स्वीकारें, पछताएँ, आगे न दोहराने का निश्चय करें - “मिच्छामि दुक्कडम्” भावना रखना
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संक्षेप में: नरक गति वह जन्म है जहाँ केवल दुःख ही दुःख है। यह हमारे ही हिंसक, क्रोधपूर्ण, द्वेषयुक्त और अधार्मिक कर्मों का फल है। जैन धर्म हमें सिखाता है कि अहिंसा, संयम और सदाचार से जीवन जीकर हम नरक गति से बच सकते हैं, और अंततः सही मार्ग पर चलकर मोक्ष की दिशा में बढ़ सकते हैं।