15 bheda moksha
जैन दरशन में “15 भेद मोक्ष” से प्रायः सिद्धों के 15 भेद का ही उल्लेख होता है। अर्थात – जो आत्माएँ मोक्ष (सिद्ध अवस्था) को प्राप्त हो गई हैं, उन्हें व्यवहार से 15 प्रकार से विभाजित किया गया है। यह केवल समझाने के लिए (व्यवहार दृष्टि से) है; वास्तव में सभी सिद्ध आत्माएँ गुणों में समान हैं।
सिद्धों के 15 भेद (मोक्ष के 15 भेद – व्यवहार से)
- जिन‑सिद्ध
जो पहले तीर्थंकर (अरिहंत) बने, फिर मोक्ष गए। – जैसे: श्री ऋषभदेव, महावीर स्वामी आदि।
- अजिन‑सिद्ध
जो तीर्थंकर बने बिना ही केवलज्ञानी होकर मोक्ष गए। – जैसे: पुंडरिक स्वामी आदि।
- तीर्थ‑सिद्ध
जब चतुर्विध संघ (साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका) वाला तीर्थ विद्यमान हो, उस काल में मोक्ष जाने वाले। – जैसे: जंबूस्वामी आदि।
- अतीर्थ‑सिद्ध
तीर्थ की स्थापना के पहले, या तीर्थ के विच्छेद (समाप्त) होने के बाद मोक्ष जाने वाले। – जैसे: मरुदेवी माता आदि (यह श्वेतांबर परंपरा का मत है)।
- गृहस्थ‑लिंग सिद्ध
गृहस्थ वेष में ही मोक्ष जाने वाले। – जैसे: मरुदेवी माता (श्वेतांबर मत)।
- अन्य‑लिंग सिद्ध
किसी अन्य (तापस, वैदिक आदि) धर्म के वेष में रहकर मोक्ष जाने वाले। – जैसे: वक्कलचीरी आदि।
- स्व‑लिंग सिद्ध
जैन मुनि (साधु वेष) में मोक्ष जाने वाले।
- स्त्री‑लिंग सिद्ध
स्त्री शरीर से मोक्ष जाने वाली। – जैसे: चंदनबाला आदि (यह भी श्वेतांबर मत है; दिगंबर परंपरा स्त्री‑देह से सीधे मोक्ष नहीं मानती)।
- पुरुष‑लिंग सिद्ध
पुरुष शरीर से मोक्ष जाने वाले। – जैसे: गौतमस्वामी आदि।
- नपुंसक‑लिंग सिद्ध
नपुंसक शरीर से मोक्ष जाने वाले। – जैसे: गांगेय आदि (यह भी मुख्यतः श्वेतांबर ग्रंथों में).
- प्रत्येक‑बुद्ध सिद्ध
किसी बाह्य गुरु के विशेष उपदेश के बिना, कोई छोटा‑सा निमित्त (जैसे वृद्ध बैल, किसी प्रसंग से झटका) पाकर अचानक वैराग्य जागे और मोक्ष मार्ग पर लगकर मोक्ष प्राप्त करे। – जैसे: करकंडु मुनि आदि।
- स्वयं‑बुद्ध सिद्ध
न गुरु का उपदेश, न बाहर का कोई खास निमित्त; केवल अपने पके हुए पुण्य‑कर्म और वैराग्य से स्वतः ही मोक्षमार्ग पर लगकर मोक्ष प्राप्त करें। – जैसे: कपिल केवलि आदि।
- बुद्ध‑बोधित सिद्ध
दूसरे के उपदेश से सम्यक‑दर्शन पाकर, वैराग्य से मोक्ष प्राप्त करने वाले। – जैसे: वायुभूति गणधर आदि।
- एक‑सिद्ध
किसी समय पर केवल एक ही जीव मोक्ष जाए। – जैसे: महावीर स्वामी का निर्वाण (उस समय अकेले मोक्ष गए माने जाते हैं)।
- अनेक‑सिद्ध
एक ही समय पर अनेक जीव मोक्ष जाएँ। – जैसे: श्री ऋषभदेव स्वामी के साथ अनेक गणों का एक साथ मोक्ष जाना।
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मुख्य बात
- सब सिद्धात्माओं का सुख और गुण पूरी तरह समान हैं – वहाँ बड़ा‑छोटा, अधिक‑कम कुछ नहीं।
- ये 15 भेद केवल शिक्षण और व्यवहार की दृष्टि से हैं, ताकि हमें विभिन्न प्रकार के मोक्ष‑मार्ग और जीवों की योग्यताओं का अंदाज हो सके।
- दिगंबर और श्वेतांबर परंपरा में विशेष अंतर मुख्यतः स्त्री‑मोक्ष और मरुदेवी माता के मोक्ष जैसे बिंदुओं पर है; पर दोनों ही मतों में यह सहमति है कि मोक्ष में पहुँचकर सभी आत्माएँ अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख और शक्ति से परिपूर्ण होकर समान हो जाती हैं।