ekatva anitya samvar aashrav aadi kya hai
ये सब “बारह भावना (१२ भावनाएँ / अनुप्रेक्षा)” का भाग हैं – ये मनन‑चिन्तन के विषय हैं, जिनसे वैराग्य बढ़ता है और पाप‑कर्म कम होते हैं।
आपने जिनके नाम लिए हैं, वे इनमें से कुछ हैं:
- अनित्य भावना (Anitya)
- अर्थ: यह संसार, शरीर, धन, रिश्ते – सब बदलने‑वाले और नाशवान हैं। - फल: आसक्ति (लगाव) कम होती है।
- अशरण भावना (Asharana)
- अर्थ: जन्म‑मरण, रोग आदि से कोई हमें नहीं बचा सकता; अन्त में आत्मा को अकेले ही फल भोगना है। - फल: अपने कर्मों के प्रति सावधानी आती है।
- संसार भावना (Sansar)
- अर्थ: जन्म‑मरण का चक्र दुख से भरा है, इसमें कोई स्थायी सुख नहीं। - फल: मोक्ष की चाह बढ़ती है।
- एकत्व भावना (Ekatva)
- अर्थ: “मैं अकेला आत्मा हूँ; जन्म अकेला, मरण अकेला; कर्मों का फल भी मैं ही अकेला भोगूँगा।” - फल: अपने उद्धार के लिए स्वयं प्रयत्न करने की प्रेरणा मिलती है।
- अन्यत्व भावना (Anyatva)
- अर्थ: शरीर, धन, रिश्ते – ये सब “मेरे से अलग” हैं; मैं इनसे भिन्न शुद्ध आत्मा हूँ। - फल: ममता व मोह घटता है।
- अशुचि भावना (Ashuchi)
- अर्थ: यह देह असुचि (मल‑मूत्र, रक्त, मांस आदि) से भरी है; आत्मा इन सबसे परे, शुद्ध है। - फल: देह‑आसक्ति घटती है, आत्मचिन्तन बढ़ता है।
- आश्रव भावना (Āsrava)
- अर्थ: मन, वचन, काय द्वारा कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) से जो कर्म‑बंधन होता है, वही “आश्रव” है – कर्मों का भीतर आना। - फल: हम सावधान होते हैं कि ऐसे कार्य न करें जिनसे नया पापकर्म बँधे।
- संवर भावना (Samvar)
- अर्थ: संयम, समिति, गुpti, ध्यान आदि से नए कर्मों के भीतर आने को रोकना ही “संवर” है। - फल: पापकर्म का नया बंध कम/बंद होता है।
- निर्जरा भावना (Nirjara)
- अर्थ: जो बँधे हुए कर्म हैं, तप, प्रायश्चित्त, सहनशीलता आदि से उनका क्षय करना – इसे निर्जरा कहते हैं।
- लोक भावना (Loka)
- अर्थ: यह लोक (संसार) अनादि‑अनन्त है, अपना‑अपना नियम है, कोई ईश्वर इसे बनाता‑चलाता नहीं।
- बोधि‑दुर्लभ भावना (Bodhi‑durlabh)
- अर्थ: सम्यग्दर्शन‑ज्ञान‑चारित्र, और सच्चा धर्म‑मार्ग मिलना अत्यन्त दुर्लभ है।
- धर्म भावना / धर्म‑स्वाख्यात भावना (Dharma / Dharmasvakhyat)
- अर्थ: जिनेन्द्र भगवान का बताया धर्म ही मोक्ष‑मार्ग है, उसे समझना‑चलना बहुत दुर्लभ सौभाग्य है।
सम्प्रदाय की दृष्टि से: ये १२ भावनाएँ श्वेताम्बर और दिगम्बर – दोनों परम्पराओं में मान्य हैं; अर्थ में कोई मूलभूत मतभेद नहीं, बस भाषा‑शैली और उदाहरण अलग‑अलग ग्रन्थों में हो सकते हैं।
थोड़ा विस्तार से पढ़ने के लिए आप यहाँ देख सकते हैं: बारह भावना (Twelve Bhavnas) पर लेख