nabhi ke niche mastishk k upar nahi karni chhaiye
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आपका वाक्य थोड़ा अधूरा लग रहा है – “नाभि के नीचे, मस्तिष्क के ऊपर नहीं करनी चाहिए” – किस चीज़ की बात कर रहे हैं, यह साफ़ नहीं है।
जैसे, आप क्या पूछना चाहते हैं:
- ध्यान में एकाग्रता (concentration) कहाँ करनी चाहिए / नहीं करनी चाहिए?
- आत्मा का स्थान नाभि के नीचे है या मस्तिष्क में – इस बारे में?
- या फिर किसी क्रिया (जैसे हाथ रखना, लेटने का तरीका, आसन आदि) के बारे में?
जैन धर्म में सामान्य रूप से यह समझाया जाता है कि:
- आत्मा का वास्तविक स्वरूप शरीर से अलग है, परन्तु उपयोग / अनुभव प्रायः हृदय-प्रदेश (छाती के बीच का भाग) से माना जाता है, न कि नाभि के नीचे या सिर्फ़ मस्तिष्क में।
- ध्यान, समता, स्वाध्याय आदि में ज्यादातर आचार्य अन्तर्मुखी होकर आत्मचिंतन पर ज़ोर देते हैं, न कि किसी एक शारीरिक बिन्दु (navel या brain) को ही सबकुछ मानने पर।
कृपया एक बार साफ़ लिख दें कि आप किस विषय पर पूछ रहे हैं, जैसे: “ध्यान में नाभि के नीचे ध्यान लगाना सही है या नहीं?” या “आत्मा नाभि के नीचे होती है या मस्तिष्क में?”
तब मैं जैन आगम और आचार्यों की वाणी के आधार पर, सरल भाषा में सही उत्तर दे सकूँगा।