raavan k tirthankar nam bandh karne me nimitt kya tha
जैन दृष्टि से पहले ये बात साफ समझ लें:
- जैन आगम‑ग्रंथों में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि रावण ने तीर्थंकर नाम‑कर्म बाँधा है या भविष्य में वह तीर्थंकर होगा।
- प्रमाणिक जैन परंपरा (दिगंबर और श्वेतांबर – दोनों) के अनुसार, हर काल में केवल २४ तीर्थंकर ही होते हैं, और इस अवसर्पिणी काल के २४ तीर्थंकर निश्चित हैं; इनमें रावण का नाम नहीं आता।
इसलिए:
- “रावण ने तीर्थंकर नाम बँधा” – यह बात ही शास्त्रानुसार सही नहीं है।
- जब ऐसा कोई नाम‑कर्म बंध स्वीकार ही नहीं, तो “उसके बंधने का निमित्त क्या था?” – यह प्रश्न जैन शास्त्र‑दृष्टि से उठता ही नहीं।
थोड़ा सिद्धांत:
- तीर्थंकर नाम‑कर्म बहुत विशेष पुण्य और अत्यन्त शुद्ध भावों से बँधता है –
- रावण के बारे में जो भी कथाएँ हैं, उनमें हिंसा, आसक्ति, शक्ति‑दुरुपयोग आदि बहुत आता है – ऐसी प्रवृत्तियों से तीर्थंकर नाम‑कर्म नहीं, उल्टा बंधन‑कारी पाप कर्म मजबूत होते हैं।
इसीलिए प्रमाणिक जैन मत के अनुसार: रावण का तीर्थंकर नाम‑बंध मानना, या उसका निमित्त पूछना – दोनों ही जैन आगम से समर्थित नहीं हैं।