Aaah ar pachane wala ek maatra sharir
लगता है आप इस तरह का वाक्य कह रहे हैं: “आहार पचाने वाला एक मात्र शरीर…” यानी – यह शरीर तो बस खाने‑पीने और पचाने के काम में ही लग जाता है।
जैन दृष्टि से समझें तो:
- यह शरीर कर्मों का फल है, यह अपना लक्ष्य नहीं है।
- इसका काम सिर्फ खाना, सोना, सुख भोगना नहीं, बल्कि आत्मा की उन्नति के लिए साधना करना है।
- शास्त्रों में बार‑बार कहा गया है कि मनुष्य जन्म बहुत कठिन से मिलता है – यदि इसे केवल “आहार पचाने” में ही लगा दिया, तो यह जन्म व्यर्थ चला जाता है।
- सही उपयोग यह है कि:
यदि आप किसी खास जैन सूत्र या गाथा की पंक्ति की ओर इशारा कर रहे हैं, तो कृपया पूरा वाक्य या संदर्भ लिख दें, ताकि मैं उसका सही अर्थ (अर्थ/भाषांतर) बता सकूँ।