18 paap me vilom shabd
अक्सर “18 पापों के विलोम शब्द” से दो तरह की बात पूछी जाती है:
1) हर पाप का साधारण उल्टा (सद्गुण) 2) साधक के जीवन में जिसे अपनाना चाहिए ऐसा सकारात्मक भाव
नीचे 18 पाप और उनके सरल विलोम (सकारात्मक रूप) दिए हैं:
- प्राणातिपात (हिंसा) → अहिंसा, जीव-दया
- मृषावाद (झूठ) → सत्यवादिता
- अदत्ता-दान (चोरी) → अस्तेय, ईमानदारी, “जो मेरा नहीं वह न लूँ”
- मैथुन (असंयम) → ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-संयम
- परिग्रह (अधिक संग्रह/आसक्ति) → अपरिग्रह, संतोष, सरलता
- क्रोध → क्षमा, शांति, धैर्य
- मान (घमण्ड) → विनय, नम्रता
- माया (छल-कपट) → सादगी, निष्कपटता, सीधापन
- लोभ (लालच) → संतोष, त्याग, उदारता
- राग (अधिक लगाव) → वैराग्य, समत्व, आसक्तिहीनता
- द्वेष → मैत्री, करुणा, समदृष्टि
- कलह (झगड़ा) → सौहार्द, शान्तिपूर्ण व्यवहार
- अभ्याख्यान (झूठा आरोप) → सत्यनिष्ठ न्याय, निष्पक्षता
- पैशुन्य (चुगली, निन्दा) → गुण-कथन, शुभ‑भाषा, मौन‑संयम
- रति‑अरति (पक्षपातपूर्ण पसंद‑नापसंद) → समत्व, निरपेक्षता, समान दृष्टि
- पर‑परिवाद (सतत दोष‑गणना) → आत्म‑परिक्षण, स्वदोष‑दर्शन, प्रशंसात्मक दृष्टि
- माया‑मृषावाद (कपटपूर्ण झूठ) → पारदर्शिता, निर्मल सत्य, विश्वासयोग्यता
- मिथ्यात्व‑शल्य (गलत श्रद्धा) → सम्यक‑दर्शन, सही श्रद्धा तत्त्वों में
यही 18 पाप “अधर पापस्थानक सूत्र” में आते हैं, जिनका मूल पाठ और भावार्थ आप यहाँ सरल रूप में पढ़ सकते हैं