Gotra karm ke prakaar
Gotra कर्म, 8 मुख्य कर्मों में से एक अघातिया (Aghātiya) कर्म है। इसका काम है – जीव को ऊँचा या नीचा मान-सम्मान / प्रतिष्ठा / परिवारिक स्थिति देना।
Gotra कर्म के दो मुख्य प्रकार
- उच्च गोत्र कर्म (Uchcha‑gotra Karma)
- फल: ऊँचा घर, अच्छी प्रतिष्ठा, सम्मान, कुलीन परिवार, साधु‑महात्मा, विद्वान, धनवान आदि के रूप में जन्म। - कारण (सामान्य भाव): - दूसरों का आदर करना - विनम्र रहना - गुणवानों की प्रशंसा करना - अहंकार न रखना
- नीच गोत्र कर्म (Neech‑gotra Karma)
- फल: कम प्रतिष्ठित परिवार, अपमान, तिरस्कार, समाज में कम मान‑सम्मान आदि। - कारण (सामान्य भाव): - दूसरों को तुच्छ समझना - घमण्ड, अहंकार - महात्मा / बड़ों का अपमान - ईर्ष्या, निंदा, दोष‑दर्शन
जरूरी बात
- आत्मा स्वयं में न ऊँची है, न नीची – गोत्र कर्म के कारण ऐसा भेद दिखता है।
- दोनों परम्परा (दिगम्बर और श्वेताम्बर) में अर्थ यही है कि गोत्र कर्म “status‑determining” है – जन्म, कुल, समाज में मान‑अपमान आदि इससे बनते हैं।
- ऊँचे गोत्र का असली कारण गुणों का आदर है, और नीच गोत्र का कारण गुणवान का अनादर और घमण्ड है।
संक्षेप में: जितना हम विनम्र होकर सबका मान करेंगे, उतना उच्च गोत्र कर्म बन्धेगा; और जितना हम घमण्ड और निंदा करेंगे, उतना नीच गोत्र कर्म बन्धेगा।