Shok wala vruksh jo shubh hai
ये पंक्ति अधूरी‑सी लग रही है, इसलिए पहले थोड़ा साफ कर लें कि आप किस बारे में पूछ रहे हैं।
“शोक वाला वृक्ष जो शुभ है” – ऐसा वाक्य जैन आगम या प्रसिद्ध स्तोत्रों की सीधी पंक्ति नहीं है। लेकिन दो बातों से जुड़ा हो सकता है:
- उपमा (उदाहरण) के रूप में
कई जैन प्रवचनों में कहा जाता है कि: - अशुभ कर्म = दुःख / शोक का बीज - शुभ कर्म = सुख का बीज, लेकिन फिर भी जन्म‑मरण के चक्र में ही बाँधता है इसलिए कभी‑कभी समझाने के लिए बोला जाता है कि: - “शोक का वृक्ष” = संसार, जहाँ राग‑द्वेष से दुःख (शोक) उपजते हैं - “शुभ” = तुलनात्मक रूप से अच्छा कर्म, सदाचार, दान, संयम आदि, जो आगे चलकर शुद्ध मार्ग (मोक्ष‑मार्ग) की ओर ले जाते हैं
यानी, जो वृक्ष अभी शोक देता दिख रहा है, अगर हम शुभ भाव, सम्यक दर्शन‑ज्ञान‑चरित्र अपनाएँ, तो वही जीवन मोक्ष‑मार्ग में बदल सकता है – यह एक प्रकार की आध्यात्मिक समझ हो सकती है।
- किसी स्तुति / भजन की पंक्ति
संभव है कि यह किसी स्थानीय जैन भजन, प्रवचन या कथा की पंक्ति हो, जो पूरी इस तरह हो, जैसे (कल्पित उदाहरण): - “शोक-वृक्ष भी शुभ बने, जब भीतर सम्यक भाव जगे” लेकिन यह मानक आगमिक या सर्वमान्य स्तोत्र की पंक्ति नहीं लगती।
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अगर आप:
- किसी विशेष गाथा / स्तवन / भजन की पंक्ति बता रहे हैं, तो
- या आप यह पूछना चाहते हैं कि
थोड़ी और जानकारी या पूरी लाइन लिख देंगे तो मैं बहुत स्पष्ट और बिंदुवार अर्थ दे सकता हूँ।