kevalgyan without sarv sand parityag
संक्षेप में उत्तर: जैन दर्शन में केवलज्ञान बिना “सर्व-संग-परित्याग” (सभी आसक्ति का पूर्ण त्याग) के सम्भव नहीं है।
थोड़ा स्पष्ट रूप से:
- केवलज्ञान कब होता है?
- जब चार घाति कर्म (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय) पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। - खासकर मोहनीय कर्म का पूर्ण क्षय = राग-द्वेष, ममता, आसक्ति सबका अंत। - यह अवस्था 13वें–14वें गुणस्थान पर होती है (केवलि–अरिहन्त अवस्था)।
- सर्व-संग-परित्याग का अर्थ
- केवल बाहरी त्याग (घर, धन, परिवार छोड़ देना) ही नहीं, - बल्कि अंदर से भी – “मेरा” भाव, ममता, लोभ, क्रोध, मान आदि सबका पूर्ण समाप्त होना। - जब तक सूक्ष्म से सूक्ष्म आसक्ति भी है, तब तक मोहनीय कर्म बाकी है, और जब तक मोहनीय कर्म बाकी है, केवलज्ञान नहीं हो सकता।
- गृहस्थ के लिए
- गृहस्थ धर्म से बहुत ऊँची अवस्था (उच्च गुणस्थान) तक पहुँचा जा सकता है, - पर केवलज्ञान की स्थिति केवल पूर्ण वीतराग अवस्था में ही होती है, जहाँ सर्व-संग-परित्याग हो चुका होता है।
इसलिए, सिद्धान्ततः और व्यवहारतः – केवलज्ञान = पूर्ण वीतरागता = सर्व-संग-परित्याग के बिना असम्भव।