Punya paap anubandh
“Punya–paap anubandh” का मतलब है – हमारा आज का पुण्य या पाप आगे चलकर किस प्रकार का पुण्य या पाप जोड़कर (अनुबन्ध करके) लाता है।
जैन धर्म में इसे 4 भागों में समझाया गया है:
- पुण्यानुबन्धी पुण्य
- अभी जो पुण्य होगा, वह - सुख देगा और - आगे फिर से अच्छे पुण्यवाले जीवन में जन्म दिलाएगा। - उदाहरण: बहुत श्रद्धा, निर्मोह भाव, अहिंसा, दया, त्याग, स्वाध्याय आदि से किया हुआ पुण्य – जो हमें अच्छे संस्कार, सत्संग, धर्म–रुचि वाला जन्म देता है।
- पापानुबन्धी पुण्य
- अभी जो पुण्य होगा, वह - सुख तो देगा, लेकिन - आगे जाकर पापवाले जीवन की ओर ले जाएगा। - जैसे: - दान तो दिया, पर बहुत अहंकार, दिखावा, जलन, स्पर्धा के साथ। - पुण्य के फल से धन, वैभव, शक्ति मिले – पर इनका उपयोग हिंसा, मद, व्यसन में हो जाए। - बाहर से काम “अच्छा” दिखता है, पर भीतर के भाव अशुभ हैं, इसलिए आगे का परिणाम पाप की दिशा में जाता है।
- पापानुबन्धी पाप
- अभी जो पाप होगा, वह - दुख देगा और - आगे भी और पापवाला जीवन ही लाएगा। - उदाहरण: - हिंसा में आनंद लेना, क्रूरता, लगातार छल–कपट, डाका, हत्या आदि; - इनमें न पछतावा है, न बदलने की इच्छा – बस उसी में सुख लगता है। - ऐसा पाप आत्मा को और नीचा गिराता है – नरक, तिर्यंच आदि में ले जाता है।
- पुण्यानुबन्धी पाप
- अभी जो पाप होगा, वह - दुख तो देगा, लेकिन - उसके बाद आगे पुण्यवाले जीवन की दिशा खोल देगा। - जैसे: - अज्ञान, दुर्बलता या परिस्थिति से कोई गलती हो गई, - लेकिन अंदर से पछतावा, लाज, सुधार की तीव्र इच्छा है, - बीच–बीच में दया, दान, उपकार, धर्म की ओर झुकाव भी रहता है। - ऐसा व्यक्ति गिरा हुआ होते हुए भी अंदर से पूरी तरह कठोर नहीं हुआ, इसलिए उसमें आगे सुधार और पुण्य की दिशा खुली रहती है।
मुख्य संदेश (सार)
- कर्म केवल “काम” से नहीं, भाव से बंधता है।
- कोशिश यह हो कि हमारा पुण्य भी ऐसा हो जो पुण्यानुबन्धी पुण्य बने –
- और यदि कभी पाप हो जाए तो कम से कम वह पुण्यानुबन्धी पाप रहे –
इसी विषय पर बहुत सरल भाषा में विस्तृत लेख “Punya & Paap के चार अनुवन्ध” जैननॉलेज पर उपलब्ध है – आप विस्तार से पढ़ सकते हैं