Jaymalji marasa dikha paryay
आपका आशय सम्भवतः “जयमलजी महाराज सा’ के दीक्षा‑पर्याय” से है (Acharya Shri Jaymalji Maharaj Saheb).
संक्षेप में उनके जीवन के मुख्य पर्याय (पड़ाव):
- जन्म
- लगभग 300 वर्ष पहले राजस्थान क्षेत्र में जन्म। - बाल्यावस्था से ही धर्म, साधुओं व अनुशासन की ओर विशेष रुझान।
- ब्रह्मचर्य‑व्रत
- लगभग २२ वर्ष की आयु में आजीवन ब्रह्मचर्य का निश्चय किया। - गृहस्थ रहते हुए भी बहुत संयमी, साधु‑स्वभाव जीवन।
- दीक्षा‑पर्याय (साधु दीक्षा)
- विक्रम संवत १७८८, मार्गशीर्ष कृष्ण २ को उन्हें साधु‑दीक्षा मिली। - आचार्य श्री भूधरजी महाराज के शिष्य बने। - कठोर संयम, तप और आगम‑अध्ययन के कारण शीघ्र ही वे महान आगमिक विद्वान बने।
- आचार्य‑पर्याय
- उनकी धर्म‑यात्राओं, कठोराचार और शास्त्र‑प्रभावना से समाज अत्यन्त प्रभावित हुआ। - विक्रम संवत १८०५, वैशाख शुक्ल ३ (अक्षय तृतीया) को जोधपुर (सिहंपोल क्षेत्र) में चारों संघ ने उन्हें आचार्य पद से सम्मानित किया। - उसी दिवस से “अखिल भारतीय श्वेताम्बर स्थानकवासी जयमल जैन श्रावक संघ” परम्परा का आधार बना, जिसे आगे चलकर “जयगच्छ” नाम से भी जाना गया।
- संघ‑संरचना व भिक्षु‑भिक्षुणी दीक्षा परम्परा
- उन्होंने साधु‑साध्वी और श्रावक‑श्राविका के बीच एक मध्यम कड़ी के रूप में भिक्षु‑भिक्षुणी दीक्षा की परम्परा प्रारम्भ की, ताकि जो लोग पूर्ण साधु‑दीक्षा के योग्य न हों, वे भी अधिक संयमी जीवन में प्रवेश कर सकें। - कुप्रथाओं, यति‑संप्रदाय की शिथिलाचारिता का कड़ा खण्डन कर, शुद्ध जैनाचार की पुनः स्थापना का महान कार्य किया।
- अन्तिम पर्याय
- वृद्धावस्था में (लगभग विक्रम १८४१–१८५३ के बीच) मुख्यतः नागौर क्षेत्र में वास कर अधिकतर समय तप, स्वाध्याय और आत्म‑चिन्तन में लगाया। - अन्तिम पर्याय में आचार्य‑पद का भार स्वयं त्यागकर, केवल आत्म‑साधना में लीन रहे और अंत में देह‑त्याग किया।
यदि आपका प्रश्न किसी विशेष “पद, स्तवन या चौपाई – ‘जयमलजी मारसा दीखा पर्याय…’” की शब्दावली/अर्थ के बारे में है, तो कृपया वह पूरा पाठ लिख दें; तभी उसका शुद्ध अर्थ पारम्परिक जैन दृष्टि से बता पाना सम्भव होगा।