22 parishah me hum dono ke vilom shabh aate hai
22 परीषह (parishaha) तो जैन धर्म में कठिनाइयाँ / कष्ट हैं, पर इनमें “हर एक के साथ उसका विपरीत शब्द” ऐसा जोड़ा नियमित रूप से नहीं आता।
हाँ, कुछ परीषह अपने‑आप में विपरीत‑स्वभाव वाले जोड़े जैसे लगते हैं, जैसे:
- शीत (ठंड) – उष्ण (गरमी)
- सत्कार‑पुरस्कार (सम्मान, आदर) – इसका स्वभाविक विपरीत है निन्दा / अपमान,
और निन्दा‑गाली अलग से अक्रोष, बाधा आदि परीषहों में आ जाती है।
लेकिन पूरे २२ परीषह इस तरह “दोनो‑दोनो के विलोम शब्द” के रूप में नहीं बने हैं। इनका उद्देश्य है – साधु या साधक हर प्रकार के सुख‑दुख, लाभ‑हानि, ठंड‑गरमी, सम्मान‑अपमान में समभाव रखना।
संक्षेप में:
- २२ परीषह = २२ तरह की सहन करने योग्य कठिनाइयाँ।
- इनमें से कुछ में स्वभाव से विपरीत जोड़ी (जैसे ठंड‑गरमी) दिखती है,
- पर सभी २२ “विलोम‑शब्दों की जोड़ी” के रूप में नहीं गिने जाते।