Patna churaya toh putra ratna ko kho diya
“पटना चुराया तो पुत्र‑रत्न को खो दिया”
इस वाक्य / कहावत का सीधा सा अर्थ है: जिसने किसी और का धन‑नगर (यहाँ प्रतीक रूप से “पटना”) चोरी से लिया, उसने बदले में अपने ही घर का सबसे बड़ा रत्न – “पुत्र” – खो दिया।
मतलब:
- चोरी, लोभ और अन्याय से जो मिलता है, वह टिकता नहीं।
- उलटा, उसका फल इतना कठोर आता है कि आदमी अपना सबसे प्यारा, सबसे मूल्यवान “रत्न” तक खो देता है।
जैन दृष्टि से इसमें दो मुख्य बातें सिखाई जाती हैं:
- अस्तेय / अचौर्य (चोरी न करना)
- बिना अधिकार की चीज लेना पाप है, चाहे वह वस्तु हो, शहर हो, पद हो या किसी की मेहनत का फल। - ऐसे पाप से अर्जित संपत्ति अंत में भारी दुःख का कारण बनती है।
- अपरिग्रह (अधिक संग्रह व लोभ छोड़ना)
- पराए धन‑संपत्ति की लालसा ही मनुष्य को चोरी, हिंसा और असत्य की ओर धकेलती है। - जो जितना अधिक परिग्रह (संग्रह‑लोभ) करेगा, उतना ही अधिक क्लेश और हानि को बुलाएगा।
इसलिए यह पंक्ति कोई आगमिक सूत्र नहीं, बल्कि जैन उपदेशों में मिलने वाली प्रकार की एक नैतिक चेतावनी है: पराया चुराओगे तो अपना सबसे कीमती खो दोगे।