Ratna churaya toh putra ratna ko kho diya
“Ratna churaya toh putra‑ratna ko kho diya” का साधारण अर्थ है:
जिसने रत्न (गहने/धन) चुराए, उसने अपने ही रत्न‑समान पुत्र को खो दिया।
इसमें दो बातें समझाई जाती हैं:
- पाप का फल निश्चित है
- चोरी, हिंसा, कपट आदि कोई भी पाप कभी व्यर्थ नहीं जाता। - उसका फल इस जन्म में भी आ सकता है और अगले जन्मों में भी। - यहाँ संकेत है कि धन के लिए अधर्म किया, तो बदले में उससे भी बड़ा “धन” – अपना पुत्र – खो दिया।
- सच्चा ‘रत्न’ क्या है?
- बाहर का रत्न = सोना, हीरा, जवाहरात, पैसा आदि – यह नाशवान है। - भीतर का रत्न = जीव, सद्गुण, धर्म, संतानों का सुशील होना, शांति – यह ही वास्तव में मूल्यवान है। - जब हम लोभ में आकर पाप करते हैं, तो थोड़े से बाहरी लाभ के लिए बड़ा आंतरिक नुकसान कर बैठते हैं।
जैन दृष्टि से संदेश:
- अपरिग्रह (सयंत परिग्रह) और अचौऱ्य –
- ऐसे पाप कर्मों के कारण दुखद परिणाम (संतान का दुख, परिवार का बिछोह, मानसिक अशांति) भोगने पड़ते हैं।
- इसलिए जैन धर्म सिखाता है कि:
संक्षेप में: लोभ के कारण किया गया अधर्म, अंत में हमसे हमारा सबसे प्रिय भी छीन लेता है।