जैन अतिचार सूत्र
“जैन अतिचार सूत्र” से दो बातें जुड़ी होती हैं:
- “अतिचार” का अर्थ
- विशेष “अतिचार सूत्र” जो प्रातिक्रमण में पढ़ा जाता है
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1. अतिचार क्या है?
अतिचार (अतिक्रम / अतिचार) = व्रत या नियम का छोटा उल्लंघन / चूक, जो
- कभी जान-बूझकर,
- कभी अनजाने में
जैसे –
- अहिंसा व्रत है, पर क्रोध में किसी को बहुत बुरा बोल देना, या
- सत्य व्रत है, पर स्वार्थ से हल्का-सा झूठ बोल देना,
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2. “अतिचार सूत्र” (श्री अतिचार सूत्र – श्रावक के लिए)
प्रातिक्रमण (विशेषकर संवत्सरी / चौमासे) में जो प्रसिद्ध “श्री अतिचार सूत्र” बोला जाता है, उसका आरम्भ इस प्रकार है:
> नाणंमि दंसणंमि अ, चरणंमि तवंमि तह य वीरियंमि > आयरणं आयारो, ईय एसो पंचहा भणिओ ॥
अर्थ (बहुत सरल भाषा में):
- मैंने ज्ञान में,
- सम्यक दर्शन में,
- चारित्र (आचरण) में,
- तप (उपवास, साधना) में,
- वीर्य (उत्साह, पुरुषार्थ) में
जो-जो अतिचार (चूक / गलती) की है – मन से, वचन से, शरीर से, जानकर या बिना जाने, सूक्ष्म (बहुत हल्की) हो या स्थूल (स्पष्ट) – उन्हें मैं स्वीकार करता हूँ, और उन सबके लिए “मिच्छामि दुक्कडं” (मेरी भूल है, क्षमा करें) कहकर प्रायश्चित्त करता हूँ।
इस सूत्र में आगे चलकर श्रावक के बारह व्रतों के साथ जुड़े अनेक अतिचारों (चूकों) का वर्णन आता है – जैसे अहिंसा, असत्य, चोरी, परिग्रह, दिग्-परिमाण, भोग-उपभोग, अनर्थ-दंड आदि में जो-जो छोटी–बड़ी गलतियाँ हो सकती हैं, उन सबका एक साथ अंगीकार और प्रायश्चित्त कराया जाता है।
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3. परम्परा (दिगम्बर / श्वेताम्बर) के बारे में
- श्वेताम्बर मूर्तिपूजक प्रातिक्रमण में यह “श्री अतिचार सूत्र” संवत्सरी / चौमासिक प्रातिक्रमण के अन्त भाग में, “श्रावक-पक्षी” के रूप में विस्तृत रूप से आता है।
- दिगम्बर परम्परा में भी अतिचार का सिद्धान्त वही है –
मूल भावना दोनों में एक ही है: “जो भी सूक्ष्म से सूक्ष्म दोष ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप और पुरुषार्थ में हो गए हों – उन्हें मानकर शुद्धि माँगना।”
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अगर आप पूरा “श्री अतिचार सूत्र” और उसका सरल अर्थ देखना चाहें, तो आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं