Bhagvan ne diksha ke purva namaskar kar kyabola tha
Bhagvān Mahāvīr ने दीक्षा लेने से ठीक पहले सभी जीवों को नमस्कार करके क्षमा‑मैत्री की भावना व्यक्त की थी। परम्परागत रूप से इसे इस तरह कहा जाता है:
प्राकृत / आराधना में प्रचलित वाक्य > Khamemi savva jīve, savve jīvā khamantu me, > Mitti me savva‑bhūesu, veram majjha na kenai.
सरल अर्थ (arth):
- मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ,
- और सब जीव मुझे क्षमा करें,
- मेरा सब प्राणियों से मैत्री‑भाव है,
- मेरा किसी से वैर नहीं है।
यही भावना थी कि – अब मैं किसी को दुःख नहीं दूँगा, सब से क्षमा माँगकर, सब से मैत्री रखकर वैर छोड़कर संन्यास (दीक्षा) ले रहा हूँ।
Śvetāmbara और Digambara – दोनों परम्पराओं में मूल भावना यही मानी जाती है: सर्वजीव मैत्री, क्षमा और अवैर के भाव के साथ भगवān ने राजपथ छोड़कर दीक्षा ली।