Char niti as per Jainism
जैन धर्म में “चार नीति” (Char Niti) नाम से कोई बहुत प्रसिद्ध या निश्चित तकनीकी पद नहीं मिलता, जैसे कि “त्रिरत्न”, “पंच महाव्रत” या “दश धर्म” मिलते हैं। परंतु जैन आचार‑शास्त्र को बहुत सरल रूप में समझाने के लिए लोग अक्सर मुख्य बातों को 3, 4 या 5 बिंदुओं में समझा देते हैं।
जैन नीति (Ethics) का मूल आधार पाँच व्रत हैं, जिनमें से हम चार को “चार नीति” की तरह बहुत सरल रूप में समझ सकते हैं:
- अहिंसा‑नीति (Ahimsa Niti)
- किसी भी जीव को सोच, वाणी और शरीर से दुख न देना। - भोजन, व्यवहार, व्यवसाय, बोलचाल – सबमें “किसी को कम से कम हिंसा हो” ऐसा प्रयास करना। - दया, करुणा और मैत्री भाव रखना।
- सत्य‑नीति (Satya Niti)
- सत्य बोलना, लेकिन ऐसा सत्य जो किसी को अनावश्यक दुख या हिंसा में न डाले। - झूठ, छल, कपट, धोखा, गाली आदि से दूर रहना।
- अस्तेय / अचौर्य‑नीति (Asteya Niti)
- जो वस्तु हमारी नहीं है, उसे बिना अनुमति नहीं लेना—चाहे वह छोटी हो या बड़ी। - चोरी, हेराफेरी, नाप‑तौल में कपट, दूसरों का हक दबाना – सब जैन नीति के विरुद्ध हैं।
- अपरिग्रह / संयम‑नीति (Aparigraha & Sanyam Niti)
- आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना, वस्तुओं, धन, पद, संबंधों में अधिक आसक्ति न रखना। - इंद्रियों और वासनाओं पर संयम रखना, साधारण और सादा जीवन की ओर बढ़ना।
इन्हीं के साथ पाँचवाँ व्रत ब्रह्मचर्य भी माना जाता है (विशेषतः साधु‑साध्वी के लिए पूर्ण रूप से), पर गृहस्थ के लिए संयमित और शुद्ध जीवन को ही मुख्य माना जाता है।