Give full atichaar
“आतिचार” का मतलब है – व्रत को तोड़े बिना भी उसकी मर्यादा के विरुद्ध जाना, यानी उस व्रत की हल्की–सी भी भूल / उल्लंघन।
आपने “full atichaar” कहा है, तो सामान्य रूप से लोग इससे पंच महाव्रतों के पाँच–पाँच आतिचार (कुल २५) का अर्थ लेते हैं। मैं वही सरल भाषा में बता रहा हूँ।
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१. अहिंसा महाव्रत के ५ आतिचार
अहिंसा व्रत = किसी भी जीव को मन, वचन, काया से कष्ट न देना।
इसके आतिचार:
- बाधा (बाधन) – किसी को पकड़ना, बाँधना, कैद करना, बंद रखना।
- छेद (चेदना) – काटना, छेद करना, मारने जैसे कार्य।
- परिवारण – किसी को घेर लेना, रास्ता रोकना, भागने से रोकना कि वह डर या कष्ट में पड़े।
- उच्छेदन – जड़ से नष्ट कर देना (जैसे पेड़ को उखाड़ना, कीटों को जहर से मिटा देना इत्यादि)।
- विवक्षा / दंड़ / अनुदान – स्वयं न मारना, पर किसी और को मारने के लिए कहना, प्रेरित करना, या साधन देना (उकसाना, अनुमति देना, प्रशंसा करना इत्यादि)।
इन पाँच में से कोई भी काम करना अहिंसा महाव्रत का आतिचार है।
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२. सत्य महाव्रत के ५ आतिचार
सत्य व्रत = हितकर और यथार्थ बात कहना, झूठ न बोलना।
इसके आतिचार:
- मृषा भाषण – साफ झूठ बोलना।
- अपवाद – किसी की निन्दा, चुगली, बदनामी करना, बेकार में दोष लगाना।
- रहस्य भंग – किसी का गुप्त भेद / रहस्य, बिना कारण खोल देना।
- असम्पूर्ण / मिथ्या कथन – अधूरा, तोड़–मरोड़ कर, भ्रामक ढंग से कहना कि सामने वाला गलत समझे।
- अहितकर सत्य – ऐसा कठोर सत्य जो किसी को बहुत दुःख या हानि पहुँचाए, बिना कारण या बिना उचित मर्यादा के बोलना (जैसे क्रोध में कटु वचन)।
सत्य व्रत में वचन सदैव हितकर, मर्यादित और यथार्थ होना चाहिए; इन पाँच में से कोई भी व्यवहार आतिचार है।
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३. अचल (अस्तेय) महाव्रत के ५ आतिचार
अस्तेय / अचौर्य व्रत = बिना अधिकार किसी वस्तु का ग्रहण न करना।
इसके आतिचार:
- अदत्तादान – मालिक की इच्छा के बिना कोई चीज़ लेना (चोरी, छुपाकर लेना)।
- अपहरण / हरण – दबाव, बल, धमकी से किसी की चीज़ छीन लेना।
- न्यूनाधिक व्यापार / तोल–मोल में कपट – नाप–तौल, माप, गिनती में कमी–बेशी करके लाभ उठाना।
- कपट–व्यवहार / जालसाज़ी – नकली सामान, झूठे कागज़, मिलावट, फर्जीवाड़ा से लाभ लेना।
- चोरी में सहमति / प्रेरणा / सहयोग – खुद न चोरी करना लेकिन किसी को चोरी में मदद देना, उकसाना, साधन देना, चुराया सामान खरीदना, आदि।
ये सभी दूसरों की संपत्ति पर अन्यायपूर्ण अधिकार हैं, इसलिए अस्तेय व्रत के आतिचार हैं।
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४. ब्रह्मचर्य महाव्रत के ५ आतिचार
ब्रह्मचर्य व्रत = इन्द्रिय संयम और काम–विकारों से निवृत्ति।
इसके आतिचार (साधारण रूप से):
- काम–विचार – कामुक कल्पनाएँ, मन में कामी चिंतन करना।
- काम–वचन – कामोत्तेजक बातें, इशारे, गीत, चर्चा आदि से काम को बढ़ाना।
- काम–कर्म – शारीरिक रूप से काम–सम्बंधी कृत्य करना।
- काम–साधन – चित्र, साहित्य, दृश्य, संगति, वस्त्र, आभूषण आदि से जानबूझकर काम–भावना जगाना।
- काम–प्रेरणा / अनुमोदना – स्वयं न भी करना, परन्तु दूसरों को काम–विकार में धकेलना, प्रोत्साहन देना, या उसकी प्रशंसा करना।
इनसे ब्रह्मचर्य की शुद्धि नष्ट होती है, इसलिए ये सब आतिचार कहलाते हैं।
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५. अपरिग्रह महाव्रत के ५ आतिचार
अपरिग्रह व्रत = आवश्यकता से अधिक पदार्थ, व्यक्ति, स्थान, भाव आदि का आसक्तिपूर्वक संग्रह न करना।
इसके आतिचार:
- अत्यधिक द्रव्य–परिग्रह – आवश्यकता से बहुत अधिक धन, वस्तुएँ, घर, भू–भाग आदि रखना, सिर्फ़ लोभ के कारण।
- संबंध–परिग्रह – “यह मेरा–यह मेरा” की आसक्ति से रिश्तों पर अत्यधिक अधिकार–भाव, मोह, पक्षपात रखना।
- मान–परिग्रह – पद, प्रतिष्ठा, पदवी, ओहदा, सफलता आदि के प्रति चिपकाव, अहंकार और लालसा।
- भोजन–परिग्रह / इन्द्रिय–विलास – तरह–तरह के स्वाद, वस्त्र, सुख–सामान के पीछे भागना, संग्रह करना, उनसे छूट न पाना।
- भविष्य–चिन्ता–परिग्रह – अनन्त भविष्य की चिन्ता में निरंतर संग्रह, जमा–पूँजी, सुरक्षा के नाम पर लोभ बढ़ाते रहना, जिससे धर्म और त्याग खो जाए।
अपरिग्रह का मूल भाव है – कम में संतोष, लोभ से दूर रहना। जहाँ अनावश्यक संग्रह है, वह अपरिग्रह का आतिचार है।
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परम्परा भेद के बारे में
- दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों ही परम्पराओं में पाँच–पाँच आतिचार की प्रधान भावना लगभग एक ही है,
- सबका मूल उद्देश्य एक ही है – व्रत की पूर्ण पवित्रता, और सूक्ष्म से सूक्ष्म दोष से बचना।
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यदि आप किसी एक व्रत के आतिचार विस्तार से (उदाहरणों सहित), या गृहस्थ अणुव्रतों के विशिष्ट आतिचार अलग से जानना चाहें, तो वह भी विस्तार से बताये जा सकते हैं।