tachka phodne se paap kyu lagta hai
“टाचका फोड़ने से पाप क्यों लगता है?” – इसे बहुत साधारण और जैन दृष्टि से समझते हैं।
आम तौर पर लोग “टाचका/दाना फोड़ना” कहते हैं – मतलब शरीर पर आया हुआ फोड़ा/दाना/पिम्पल नाखून से दबाकर फोड़ देना।
जैन दृष्टि से इसमें पाप के मुख्य कारण:
- सूक्ष्म जीवों की हिंसा
- हमारे शरीर, खून, मवाद, पस, पसीने आदि में अनगिनत सूक्ष्म जीव (सूक्ष्म निगोद आदि) होते हैं। - जब हम जोर से दबाकर दाना फोड़ते हैं, तो: - त्वचा फटती है, - खून / पस निकलता है, - और उसके साथ बहुत सारे सूक्ष्म जीव नष्ट होते हैं। - जैन दर्शन में एक इंद्रिय वाले बहुत सूक्ष्म जीव को भी मारना हिंसा ही माना जाता है। - इसलिए यह “अनावश्यक हिंसा” है – और हिंसा से पाप बंधता है।
- कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ)
- अक्सर हम दाना गुस्से में या चिड़चिड़ाहट में फोड़ते हैं – “ये क्यों निकला है, हटाओ इसे!” - यह क्रोध और देह-आसक्ति (शरीर के रूप के प्रति चिपकाव) से किया गया काम होता है। - जैन सिद्धांत में पाप सिर्फ बाहरी काम से नहीं, “भाव” से भी बंधता है। - क्रोध/घृणा/असंतोष के साथ की गई हिंसा अधिक पाप देती है।
- अनावश्यक और टालने योग्य हिंसा
- घर-गृहस्थी में कुछ हिंसा “अत्यन्त टालने पर भी” रह जाती है – जैसे चलने से मिट्टी के जीव मरना आदि – उसे अल्प माना जाता है। - लेकिन दाना फोड़ना ज़रूरी काम नहीं है, बिना फोड़े भी रह सकते हैं – या जरूरत हो तो डॉक्टर से इलाज करवा सकते हैं। - जहाँ हिंसा टाली जा सकती हो और फिर भी हम अपने मन की चाह से करें – वहाँ पाप ज़्यादा माना जाता है।
- शरीर-सजावट के लिए हिंसा
- ज़्यादातर दाना इसलिए फोड़ा जाता है कि “चेहरा अच्छा दिखे”, यानी रूप–सुख के लिए। - सिर्फ सौंदर्य के लिए जीव-नाश करना जैन धर्म में बहुत खराब भाव माना जाता है, क्योंकि यह लोभ और देहाभिमान से जुड़ा है।
तो क्या कभी फोड़ ही नहीं सकते?
- आदर्श जैन दृष्टि:
- यदि बहुत तकलीफ हो, इंफेक्शन हो, दर्द हो:
संक्षेप में: टाचका/दाना फोड़ने से पाप इसलिए लगता है क्योंकि:
- उससे सूक्ष्म जीवों की अनावश्यक हिंसा होती है,
- आमतौर पर वह क्रोध, घृणा, रूप–आसक्ति जैसे कषाय से किया जाता है,
- और यह पूरी तरह टालने योग्य हिंसा है।
जितना संभव हो,
- दाने को न छेड़ें,
- सफाई रखें,
- जरूरत हो तो डॉक्टर से इलाज कराएँ,
- और प्रतिदिन थोड़ा-बहुत प्रायश्चित/प्रतिक्रमण अवश्य करें – ताकि ऐसे छोटे-छोटे कर्म भी धीरे-धीरे हल्के हों।